जब गंगा बनी गंगिया

उसके मां-बाप ने बड़े शौक से नाम रखा था गंगा जिसे लोगों ने गंगिया कर दिया।

अटपटा था मगर गंगा को कोई फर्क नहीं पड़ता। अलबत्ता कोई उसे गंगा कहता तो वह अपनी बड़ी-बड़ी आंखें उठाकर उसे एकबार जरूर देखती थी। अपने नाम के अनुरूप संुदरता की मूर्ति थी मालन की बेटी-गंगा। अपनी फूलों की दुकान में रोज ही सज-धज कर बैठ जाती। रंगे-बिरंगे फूलों के बीच वह भी एक फूलकुमारी सी दिखती थी। उसकी यह दुकान राय साहब की कोठी के ठीक पीछे वाली सड़क पर लगती थी। वैसे तो राय साहब को गुजरे जमाना हो गया पर उनकी इस बड़ी जागीर को उनका इकलौता पुत्र राजीव संभालता था जो अभी हाल ही में विदेश से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर लौटा था। राय साहब की पत्नी यानि राजीव की माता अपने शरीर से लाचार थी। चलने-फिरने के लिए उन्हें किसी की सहायता लेनी पड़ती थी। नौकर-चाकर उनकी देखभाल में लगे रहते थे। पड़ोस में रहने की वजह से गंगा के मां-बाप भी राजीव की माता के लिए हाजिर रहते थे। इसके बदले में उन्हें कोठी से काफी कुछ मिल जाता था। आस पास में रहने वाले लोगों का जीवन ही इस कोठी के बदौलत चल रहा था।

इस पूरे शहर में राजीव सिर्फ रोजी को ही जानता था जो उसकी बचपन की मित्र रही है। रोजी के परिवार का नाम भी शहर के अमीर उद्योगपतियों में शुमार होता था। राजीव अपने फाॅर्म हाउस की तरफ जब भी जाता रोजी से मिलकर जाता या उसे साथ ले लेता। आज ड्राइवर की जगह खुद ही राजीव ने गैराज से गाड़ी निकाली। कोठी के पीछे से मुड़ा ही था कि उसकी गाड़ी गंगा के फूलों के दुकान पर यकायक रूक जाती है। उसकी नजर कभी सफेद बेली के फूल से हटती तो गंगा के चेहरे पर टिक जाती।

‘‘बाबूजी! कुछ पैक कर दूं।’’ गंगा नर्वस थी। उसने भी इससे पहले कोठी के मालिक को नहीं देखा था।

‘‘हां! सफेद बेली के फूलों का हार बना दो।’’ वह अपनी लंबी कार से नीचे उतर गया। गंगा नजरें झुकाए फूलों में सूई चुभोने लगी। राजीव महकती फूलों की कलियों को छूने लगा। 

‘‘रोज दुकान लगाती हो? रहती कहां हो?’’ राजीव एक साथ सब जान लेना चाहता था।

‘‘हरि माली की बेटी हूं। आप जानते तो हो। बड़ी मालकिन ने ही तो यहां बैठने की इजाजत दी है।’’ यह कहते हुए गंगा ने एक बार भी नजर उठाकर राजीव की तरफ नहीं देखा। राजीव ने हार लिया और पैसे देने लगा।

‘‘नहीं बाबूजी! ऐसा मत करो। बाबा को पता चला तो मुझे डांट पड़ेगी।’’

‘‘तो फिर रोज तुम्हारे फूल नहीं ले पाउंगा।’’ राजीव ने नकली नाराजगी दिखाई।

‘‘बाबा के हाथ पूजा के फूलों के साथ आपके लिए भी हर दिन भेज दिया करूंगी।’’ राजीव उसे ऐसा करने से मना करता है। इस बहाने वह गंगा के दीदार से महरूम नहीं होना चाहता था। अब तो फूलों के लेनदेन का सिलसिला चल पड़ा। राजीव की गाड़ी रोज गंगा के पास रूकती और लंबी बातचीत का दौर शुरू हो जाता। आते-जाते लोगों के बीच यह चर्चा आम होने लगी थी। विदेश से लौटकर आए राजीव को गंगा की सादगी बड़ी भाती थी। गंगा को राजीव की कई बातें समझ नहीं भी आती तो वह मुस्कुराकर हां या ना कहती। एक दिन राजीव के साथ रोजी भी गंगा के दुकान पर आ जाती है।

‘‘यकीन करोगी यह हमारे माली की बेटी है। किसी अप्सरा की तरह लगती है।’’ राजीव ने गाड़ी बढ़ाते हुए रोजी से यह बात कही।

‘‘क्यों जनाब का दिल आ गया अपने माली की बेटी पर।’’ रोजी ने ठहाका लगाया।

‘‘नहीं। ऐसी बात नहीं है। मैं बताना चाह रहा था कि सुंदरता किसी की मिल्कियत नहीं है।’’ राजीव  ने सफाई देनी चाही।

‘‘बॉस! इसे कहते हैं कीचड़ में कमल खिलना।’’ और उनकी गाड़ी कोठी में प्रवेश कर गई। बात इतने में खत्म नहीं हुई। गंगा की तारीफ रोजी के गले में फांस बन गई क्योंकि राजीव का मन यूंही किसी पर नहीं आता। वह मौके तलाशने लगी। उसे पता था कि चांदनी रातें राजीव को बहुत पसंद है। ऐसी ही एक रात में वह गाड़ी निकालकर राजीव की कोठी की तरफ चल पड़ती है। कोठी के पीछे उसे दो परछाई टहलते नजर आते हैं। वह छिपकर देखने लगती है। राजीव और गंगा पेडों के ओट में बैठकर बातें कर रहे थे। माजरा समझकर वह बिना किसी से मिले वहां से तेजी से निकल जाती है। इस बात को बीते कई दिन हो गए। राजीव अपने काम में व्यस्त होने की वजह से रोजी और गंगा किसी से भी नहीं मिल पा रहा था। एक दिन रोजी फोन कर उसे अपने घर खाने पर बुलाती है। राजीव डायनिंग टेबल पर बैठा था और रोजी किसी का फोन अटेंड कर रही थी, तभी वह चैंककर देखता है कि गंगा खाने का टेबल सजा रही है।

‘‘तुम यहां!’’ राजीव की अवाज उसके गले में ही अटक गई। गंगा ने कोई जवाब नहीं दिया।

‘‘अरे! यह क्या बतायेगी। मुझे इसपर दया आ गई। तुम्हीं तो तारीफ करते थे इसकी। आखिर फूल बेचकर कब तक गुजारा करती। किसी की बुरी नजर भी पड़ सकती थी, इसलिए इसे अपने घर ले आई। थोड़े दिनों के बाद देखना गंगिया की शादी भी कर दूंगी।’’ रोजी एक सांस में बोल गई।

‘‘गंगा! तुम बताओ। सच क्या है।’’ राजीव बेचैन था।

‘‘क्या गंगा-गंगा लगा रखा है। अब यह गंगिया है।’’ गंगा की आंखें नम थी जिसे राजीव ने देख लिया था। उसने खाने की प्लेट अपने आगे से सरका दिया। गंगा ने चुप्पी तोड़ी। उसने रोते हुए सबकुछ सच बता दिया जिसे सुनकर राजीव के होश उड़ गए।

‘‘बाबूजी! गंगिया ही हूं मैं। गंगा और गंगिया में क्या फर्क है। मालन की बेटी हूं, जैसे चाहो वैसे बुलाओ।’’ कुछ रूककर, ‘‘मैडम एक दिन मेरे पास आकर बोली कि मुझे इनके घर में नौकरानी का काम करना होगा। नहीं किया तो इस चम्बा शहर में रहने नहीं देगी। मैं गरीब समझ नहीं सकी कि आखिर मैंने इनका बिगाड़ा क्या है। हमारे घरवाले डर गए साहब।’’

राजीव टेबल से उठकर गंगा के पास आता है। उसका हाथ पकड़कर  बोलता है, ‘‘तुम गंगा हो। मन से साफ और तन से पवित्र। तुम्हारी जगह कहीं और है। यह सजा तुम्हें मेरे कारण मिली है। घर चलो। वहीं समझाउंगा।’’ बिना रोजी की तरफ देखे वह गंगा को लेकर वहां से चल पड़ता है। 

-मनोज सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार )

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