खुशी

‘‘इस साइकिल के टायर चौड़े और मजबूत हैं ताकि जब कोई छोटा बच्चा इसकी सवारी करे तो पलट कर गिर न पड़े।’’ साइकिल दुकानदार भल्ला ने कहा।

‘‘वो तो ठीक है पर पैसे थोड़े ठीक लगा लो। पोते के लिए ले रहा हूं, आज उसका जन्म दिन है।’’

‘‘दीनानाथ जी! आप बुजुर्ग हैं और आपको मैं पहले से जानता हूं इसलिए सौ-दो सौ कम दे देना। इससे ज्यादा नहीं कर पाउंगा।’’ भल्ला पक्का बिजनेस मैन था। आज पोता एक साल का हो गया और बहू ने सुबह चलते समय ही कहा था कि बाबूजी जल्दी घर आ जाइएगा। दीनानाथ सोफे बनाने वाली फैक्टरी में बढ़ई का काम करता था जहां से उसने एडवांस पैसे लिए और साइकिल खरीदी। आज के दिन को वह खास बनाना चाहता था। अपनी साइकिल के पीछे बच्चे की ट्राई-साइकिल कसकर बांध ली और वहां से चल पड़ा। उसके पैडल खुद-ब-खुद तेज चल रहे थे। बहुत दिनांे बाद उसके घर में यह खुशी का मौका आया था।

साइकिल के पहिए जितनी तेजी से आगे बढ़ रहे थे दीनानाथ का दिमाग उसी गति से पीछे झांकने लगा था। बाप का साया बचपन में ही उसके सिर से उठ गया था। घर चलाने के लिए बेलदार का काम करने लगा। कुछ खेती-बाड़ी थी जिससे मां-बेटे का गुजारा चलता था। होश संभाला तो मां ने शादी करा दी जिसके बाद खुशी का वह दिन भी आया जब दाई चाची ने बताया कि दीनू तेरे घर बेटा हुआ है मगर उसने साथ में यह भी जोड़ दिया कि वह पोलियो से ग्रसित है। आज भी ललन वैशाखियों के सहारे चलता है। गांव के प्रधान से कह-सुनकर बाजार में उसके लिए एक पीसीओ की दुकान दिलवा रखी है। अब तो अपनी जिंदगी से ललन ने भी समझौता कर लिया मगर जब छोटा था तो दूसरे बच्चों को दौड़ता देख उनकी नकल करता और हर बार लड़खड़ा कर गिर पड़ता। एक बार तो उसने हद ही कर दी। कहने लगा, दद्दा फुटबाॅल खेलूंगा। मुझे बाॅल लाकर दो। मैंने ला दी। मगर वह बाॅल खुशी के बजाय गम देकर गया। ललन को पहली बार एहसास हुआ कि वह दूसरों से अलग है। उस दिन जब उसने कहा कि दद्दा अब कभी बाॅल नहीं मागूंगा-मैं तो लंगड़ा हूं तो इस बात ने सीना चीर दिया।

ललन की मां गायत्री अपने अपंग बेटे को घिसट-धिसट कर चलते देख आधी हो गई थी। अंदर ही अंदर वह घुलती रही। एक दिन इस बात का खामियाजा हम सबको भुगतना पड़ा। उसे लेकर हाॅस्पिटल गए। वहां पहंुचकर पता चला कि उसके फेफड़े खराब हो चुके हैं। शहर ले गया। कोई कमी नहीं छोड़ी उसके इलाज में। जमीन बेच दी। अपनी मां के पुराने गहने-जेवर बेच दिए मगर पत्नी को नहीं बचा सका। एक साल में दो-दो मौतों ने हिला दिया। पहले मां फिर बीबी चल बसी। अंधेरे में डूबा हुआ था कि किसी ने सलाह दी कि बेटे ललन की शादी कर दो।

‘‘कब तक मातम मनाते रहोगे! ललन भी टूटता जा रहा है।’’ पड़ोसी जुम्मन ने कहा।

‘‘हमें अपनी बेटी देगा कौन? बहुत बदनसीब हैं भैया हमलोग।’’

‘‘तुम अपने किसी सगे-संबंधी से बात करो। कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा।’’ जुम्मन के कहने पर कई जगह बात चलाई मगर इज्जत रखी बचपन के दोस्त भरत ने। उसने अपनी प्यारी बेटी को हमारे घर की बहू बना दिया। मालती बेटी बन कर हम बाप-बेटों के डूबते जीवन में बहार ले आई। बाबू के आ जाने के बाद तो जैसे हम सबकुछ भूल गए। कल से उसकी साइकिल को खुद ही धक्का लगाउंगा। कितना मजा आएगा। जो अपने ललन के साथ नहीं कर सका अब वह सारे अरमान पोते के साथ पूरे करूंगा।

इसी सोच में डूबा मन ही मन मुस्कुराता वह बढ़ा जा रहा था कि एक तेज जीप ने उसकी साइकिल को पीछे से धक्का मार दिया। दीनानाथ छिटककर दूर जा गिरा। जीप के पहिए उसकी साइकिल को रौंदती चली गई। जब होश आया तो उसने अपने आपको एक अस्पताल के बिस्तर पर पाया।

‘‘हम यहां कैसे आ गए?’’ उसके हाथ-पैर और माथे पर पटिट्यां बंधी हुई थी।

‘‘तुम्हारा एक्सीडेंट हो गया है। किसी राह चलते व्यक्ति ने तुम्हें यहां तक पहंुचाया। अपने घरवालों का पता बताओ हम उनको यहां बुला लेंगे।’’ नर्स ने होश आने पर दीनानाथ से कहे। 

‘‘मेरी साइकिल के साथ बंधी एक बच्चे की छोटी साइकिल तो ठीक है!’’ वह बेचैन हो उठा। नर्स हैरत में थी। उसके जीवन का यह पहला अनूठा मरीज था जिसे अपनी जान, हाथ-पैर से ज्यादा अपनी साइकिल की चिंता थी। वार्ड ब्वाॅय से सारी सच्चाई जान कर वह भी दुःखी हुई।

‘‘बाबा! आप चिंता न करो। पहले ठीक हो जाओ फिर साइकिल भी देख लेंगे। तुम्हारे हाथ-पैर के फ्रेैक्चर का ठीक होना ज्यादा जरूरी है।’’

‘‘बेटी! तुम लोग ईश्वर का रूप हो। सबकी जान बचाती हो। मेरी जान तो उस साइकिल में बसी है जिसे मैं अपने पोते के लिए ले जा रहा था। आज उसका जन्म दिन है। देर हो गई तोे रोने लगेगा। मुझे किसी तरह घर भेज दो ताकि उसका सामान दे सकूं।’’ वह बूढा़ रो-रोकर मिन्नतें करने लगा।

नर्स असंजस में पड़ गई। खबर मिलते ही दीनानाथ के घर वाले भागते-दौड़ते अस्पताल पहंुचे। बहू पोते को भी साथ लाई थी जिसे देखते ही दीनानाथ की आंखें खुशी से चमक उठी। रोते हुए बहु को प्यार से डांटकर दीनानाथ ने कहा, ‘‘उस गाड़ी वाले को क्यों कोस रही हो बेटी, दरअसल मेरी ही गलती है। हम ही इतने उतावले होकर साइकिल चला रहे थे कि कुछ पता नहीं चला।’’ उसने जुम्मन को कहा कि बाहर से बाबू की साइकिल लाए। वह चुप बैठा रहा। ललन भी नजरें चुरा रहा था।

‘‘दद्दा! साइकिल आ जाएगी। तुम पहले ठीक होकर घर तो चलो।’’ ललन दुःखी था।

‘‘ठीक ही तो कह रहे हैं। बाबू कौन-सा कल से ही साइकिल चलाने वाला है।’’ मालती बोली। दीनानाथ को सारी बात समझ में आ गई। मुस्कुराहट फैल जाती है उसके होठों पर।

‘‘बेटी! वैसे तो हम गरीबों के जीवन में खुशी के मौके कम ही मिलते हैं और कई बार तो पता भी नहीं चलता कि हम खुश कब हुए थे। हमेशा रोना लगा ही रहता है। लगता है साथ मिलकर रोना ही हमारे भाग्य में लिखा है परंतु उपरवाले की बड़ी मेहरबानी है कि किसी भी सुख-दुःख में हमलोग एक दूसरे का हाथ और साथ नहीं छोड़ते। इसी में कहीं हमारी खुशी छिपी है।’’ दीनानाथ अपने मायूस परिवार वालों को ढ़ांढ़स बंधाने की कोशिश कर रहा था।   

लेखकः मनोज सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार)

                       

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