माँ !

बेटा तुम मुझे घर से इतनी दूर क्यूँ ले जा रहे हो ? हमलोग घर से कितनी दूर आ चुके हैं ! बेटा दो दिन से लगातार हम लोग ट्रेन में चल रहे हैं । और बीच में एक जगह आज सुबह तुमने ट्रेन बदला भी था । यह ट्रेन तो छोटे डब्बे जैसे दिखता है । बेटा देखो चारो तरफ ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ हैं । हाँ माँ बस अब थोड़ी देर के बाद हम लोग उतर जायेंगे, हमारा स्टेशन आने ही वाला है ।माँ बहुत दिनों से तुम्हें बाहर घुमाया नहीं था तो सोचा तुम्हें दूर कहीं एक अच्छे हिल स्टेशन का सैर करा दूँ । बेटा तुम्हें पता है न बचपन में मैं और तुम्हारे पापा तुम्हें अक्सर दूर दूर घुमाने के लिए ले जाया करते थे । तुम्हारे पापा अक्सर कहते थे “मुन्ने की माँ अपना बेटा बहुत होनहार निकलेगा । मैं इसे पूरी दुनिया घुमाना चाहता हूँ ताकि यह दुनिया की विविधता को समझे । मुन्ने की माँ तुम नहीं पढ़ी-लिखी । तुमने मुन्ने के लिए ज़िन्दगी होम कर दी । यह मेरा फ़र्ज़ है कि जो कमी हमने जीवन में महसूस किया वो कमी मुन्ना कभी नहीं महसूस कर सके” ।

पता है बेटा जब तुम्हारे पापा की तबियत ख़राब थी और डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था तो उन्होंने कहा था कि मुन्ने की माँ अब तुम ही उसके लिए सब कुछ हो । हमारे मुन्ने को किसी चीज़ की कमी नहीं होने देना । बेटा तुम्हारे पापा के जाते ही रिश्तेदारों ने गाँव की हमारी सारी जायदाद को हड़प लिया । मैं कुछ दिनों तक चुपचाप जिस रास्ते से तुम्हारे पापा शाम के वक़्त ऑफिस से आते थे उस रास्ते पर एकटक देखती रहती थी । तुम अक्सर पूछते थे माँ ,पापा अब कब वापस घर आयेंगे । मैं तुम्हें अपने गोद में भरकर चुपचाप रोती रहती थी । फिर तुम्हारे पापा के पेंशन के पैसे से मैंने एक सिलाई मशीन खरीदी । तुम्हारे पापा के पेंशन के पैसे और सिलाई करके जो मैं लाती थी उससे घर का खर्चा ,तुम्हारे स्कूल का फीस और स्कूल ड्रेस का खर्चा निकल जाता था । फिर जब तुम्हें स्कालरशिप मिला तब जाकर घर में तुम्हारे पापा के जाने के बाद वर्षों बाद खाने में सब्जी बना था । बेटा फिर भगवान् के आशीर्वाद से तुम हॉस्टल में चले गए और तुम्हारे पढाई का खर्चा सरकार ने उठाना शुरू किया ।

तुम्हें याद है बेटा एक बार जब तुम बीमार हुए थे तो 10 दिनों तक तुम्हारा बुखार उतरा ही नहीं था । मैं बहुत घबरा गयी थी । मैं रात-दिन तुम्हारे सिरहाने में बैठ कर तुम्हारे सिर पर पट्टी बदलती रहती थी । फिर एक दिन मैं कमजोरी से बेहोश होकर गिर पड़ी । थोड़ी देर बाद जब मुझे होश आया तो मुन्ना तुमने पूछा था कि माँ क्या हुआ ? तो मैं बोली थी कि बेटा कुछ नहीं आँख लग गयी थी । फिर मैं महीनों तक अन्दर से ठीक नहीं हो पायी थी ।

जब तुम्हारी नौकरी लगी तब मैं तुम्हारे पापा के फोटो के पास बैठकर घंटों रोती रही और बोली-” मुन्ना के पापा आज तुम होते तो तुम्हें सबसे अधिक ख़ुशी होती । मुन्ना से बड़ा अपने इलाके में कोई ऑफिसर नहीं बना है ।मुन्ना के पापा तुम्हारी तपस्या और त्याग रंग लाया । वहीँ से मुन्ने को आशीर्वाद खूब देना” । बेटा जब तुम्हारी शादी हुई तो लगा जैसे हमारा पुराना घर वापस आ गया है । इलाके के कितने बड़े बड़े लोग तुम्हारी शादी में आए थे । मैं चारो तरफ ऐसे घूम रही थी कि मानों तुम्हारे पापा मुझे पीछे से कह रहे हों –“ मुन्ने की माँ देखो उस रूम में गेस्टों को किसी चीज़ की कमी तो नहीं है । फिर ऐसा लगता था कि वो बाहर जाने के लिए कह रहे हों और बोल रहे हों कि मुन्ने की माँ बारातियों की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है । सारे लोगों ने शादी के बाद कहा था मुन्ने की माँ तुमने मुन्ने के पापा की कमी को पूरा कर दिया ।

बेटा, बहु शुरू में मुझे कितना मानती थी पर पता नहीं बाद में उसे क्या हो गया बात-बात में कहती थी आपके चलते ही घर में सारी समस्या है । आप एक जगह बैठ नहीं सकती । शुरू-शुरू में मैं तुम्हें बताना नहीं चाहती थी परन्तु जब असह्य होने लगा तो एक दिन मैं तुम्हें बताई थी । पर तुम सिर्फ खामोश रहे और चेहरा सख्त करके अंदर चले गए । उस दिन जब अपना नन्हा राजदुलारा बिस्तर से गिरा तो उसमें मेरी गलती नहीं थी बेटा। जब तक मैं उसे पकड़ने गयी वो बिस्तर से नीचे खिसक गया था ।

माँ हटाओ तुम भी कौन से बात शुरू कर दी । देखो माँ अब स्टेशन आने वाला है यहाँ हमलोग उतरेंगे । अपना सामान ठीक से देख लो । ट्रेन धीरे-धीरे चूं-चूं करती हुई प्लेटफार्म पर लग गयी । बहुत कम लोग थे प्लेटफार्म पर । माँ तुम उस बेंच पर बैठो। मैं कमरे के बारे में पता करके आता हूँ । ठीक है मुन्ना मैं यहीं बैठती हूँ तुम ज़ल्दी आना । मुझे यहाँ के लोगों की भाषा भी समझ में नहीं आ रही है बेटा । और हाँ मुन्ना कुछ खाने के लिए भी ले आना मुझे बहुत जोर से भूख लगी है बेटा । ठीक है माँ, मैं अभी तुरंत आता हूँ ।

माँ इस स्टेशन पर कोई कमरा नहीं है मैं अगले स्टेशन पर इसी ट्रेन से जाता हूँ और कमरा ठीक कर ज़ल्दी से आता हूँ । माँ बोली ज़ल्दी आना बेटा मुझे थोडा बुखार भी महसूस हो रहा है । तुम चिंता मत करो माँ मैं अभी गया और अभी आया । ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफार्म को छोड़ रही थी माँ आखिरी डिब्बे को जाते हुए देख रही थी । डिब्बे के पीछे लाल बत्ती रह रह कर जल रही थी । मानों यह कह रही हो जिस पथ पर यह गाड़ी जा रही है वहां जीवन यूँ ही लाल टिमटिमाते दिए की तरह बमुश्किल जलता और चलता होगा ।

ट्रेन को गए हुए तक़रीबन एक घंटा बीत गया। पूरा प्लेटफार्म सुनसान । शायद प्लेटफार्म के आसपास कहीं ज़िन्दगी होगी इसका अहसास सिग्नल वाले खम्भे के तरफ से लंगड़ाकर आते हुए काने कुत्ते से सिर्फ हो रहा था । स्टेशन के दोनों तरफ ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ थी । पहाड़ियाँ चीड़ और देवदार के वृक्षों से ढका पड़ा था । हवा सुई की तरह बदन में चुभ रही थी ।ऐसा लग रहा था मानो हड्डियों में छेद कर देगी। धीरे-धीरे सूर्य की किरणें अपना पांव समेटकर चली गयी । अँधेरे की पहली पुकार सियार के हुआँ-हुआँ की तीव्र आवाज़ ने दी। दूर केवल सिग्नल का दिया दिख रहा था जिससे स्टेशन पर रौशनी होने का अहसास होता था ।अचानक टॉर्च की तीव्र रौशनी माँ के चेहरे पर पड़ी । स्टेशन मास्टर ने पूछा कौन है ? पर माँ उस भाषा को समझ नहीं सकी । फिर स्टेशन मास्टर ने टूटी-फूटी हिंदी में कहा –माँ जी आप यहाँ अकेली क्यूँ बैठी हैं । अब तो रात के 9 बज गए अब यहाँ कोई ट्रेन भी नहीं आएगी । माँ ने कहा नहीं मेरा बेटा आने वाला है वो अगले स्टेशन पर कमरा देखने गया है । स्टेशन मास्टर ने कहा इसके आगे तो कोई स्टेशन है ही नहीं । माँ बोली नहीं नहीं मेरा बेटा मेरे सामने ट्रेन में बैठकर सिग्नल के तरफ जाती हुई ट्रेन पर बैठकर गया है । स्टेशन मास्टर बोला उधर तो यार्ड है । यह पहाड़ी जगह है इसलिए यार्ड 1 किमी आगे बनाया गया है । माँ बोली नहीं नहीं मेरा बेटा अभी आता ही होगा । माँ हाफ्ने लगी । स्टेशन मास्टर दौड़कर माँ के पास गया और उसके माथे को छूकर बोला माता जी आपको तो बहुत तेज़ बुखार है । आप चलिए मेरे घर आपको डॉक्टर की सख्त ज़रुरत है । माँ बोली नहीं नहीं, मुन्ना आकार खोजेगा तो परेशान हो जायेगा । माँ जी मैं लाइन्समैन को बता जाता हूँ कि जब तक आपका बेटा नहीं आएगा तबतक वह बीच बीच में आकर आपको देख लेगा ।

अँधेरे में स्टेशन मास्टर धीरे-धीरे प्लेटफार्म पर विलीन हो गया । माँ को लगा अभी तक मुन्ना क्यूँ नहीं आया? उसे गए दस घंटे से ऊपर हो गया । माँ के आँखों के आगे कमजोरी और बुखार से धीरे-धीरे अँधेरा छाने जैसा महसूस हो रहा था । वो आसमान के तरफ सिर घुमाई तो कई सितारों के बीच में ऐसा महसूस हुआ कि मानों मुन्ना के पापा उसे बोल रहे हों –“ मुन्ने की माँ अब तुम बहुत थक गयी हो , आ जाओ मेरे पास “। धीरे-धीरे आँखों के आगे अँधेरा और गहरा हो रहा था । उसे लगा कि वह मुन्ने के पापा के साथ शादी मंडप में बैठी है और मुन्ने के पापा वचन दे रहे हों –“ ३३ करोड़ देवी-देवताओं को साक्षी मान कर मैं वचन देता हूँ कि गायत्री की मैं तन-मन और धन से रक्षा करूँगा । अगर मृत्यु गायत्री के समीप पहुंचेगी तो पहले मैं उसका स्वागत करूँगा” । चारो तरफ धुप्प सन्नाटा।

सुबह-सुबह अँधेरे मुँह स्टेशन मास्टर जब स्टेशन आया तो देखा कि माताजी का चेहरा सफेद पड़ चुका है । सांस कब का शरीर का साथ छोड़ चुका था । ठंढ के चलते हड्डियाँ अकड़ चुकी थी । उस ठंढ में भी कपड़ो के नाम पर शरीर पर सिवाय साडी के कुछ नहीं था । स्टेशन मास्टर नजदीक के प्रशासन को फ़ोन किया तो एम्बुलेंस आ चुका था । माँ के मृत शरीर को स्ट्रेचर पर लाद कर लोग जा रहे थे । स्टेशन मास्टर के केबिन से ट्रांजिस्टर पर विविध-भारती पर यह गाना बज रहा था- “चंदा है तू, मेरा सूरज है तू, ओ मेरी आँखों का तारा है । जीती हूँ मैं बस तुझे देखकर, इस टूटे दिल का सहरा है तू” ………………………”।

लेखकः उदय कुमार (संप्रति- अधिकारी, केन्द्रीय सुरक्षा बल)

लेखक –परिचय
जन्म- 05 जनवरी 1974
शिक्षा-
स्नातक – गणित तथा विधि में (दिल्ली विश्वविद्यालय) ।
स्नातकोत्तर – मानवाधिकार , पुलिस प्रशासन एवं न्याय ।
प्रबंधन – मानव संसाधन , आपदा प्रबंधन

संप्रति- अधिकारी , केन्द्रीय सुरक्षा बल , नई दिल्ली
प्रकाशित कृतियाँ-
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं प्रकाशन तथा आकाशवाणी से प्रसारण । आतंरिक सुरक्षा प्रबंधन पर पुस्तकों का प्रकाशन ।

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