वो बैरन चिट्ठी

‘‘दादी! जल्दी से नास्ता टेबल पर लगवाओ। फ्लाइट छूट जायेगी।’’ पीहू ने कहा।

‘‘खुद ही देर करती हो। हाथ से मोबाइल ही नहीं छूटता महारानी का।’’ दादी ने बेला को आवाज लगाई।

‘‘जी मालकिन! आज तो दीदी की पसंद का नास्ता बना है।’’ हड़बड़ी मचाते हुए पीहू ने नास्ता किया और चली गई। आज उसे एक जरूरी मीटिंग में पहुंचना था।

‘‘देश-विदेश उड़ती फिरती है परंतु बचपना अभी तक नहीं गया। मैंने भी कभी उसपर लगाम कसने की कोशिश नहीं की। इसे तो अपने मां-बाप के चेहरे तक याद नहीं होंगे। उनका एक रोड़ एक्सीडेंट हो गया था जब पीहू सात-आठ साल की थी। हम दोनो की लड़ाई और लाड़-प्यार को तेरे अलावा कोई और नहीं समझ पाएगा क्योंकि तू भी तो उसके साथ ही बड़ी हुई है।’’ पीहू के बाद बेला ही थी जिससे दादी अपने दिल की बात करती थी। 

‘‘मालकिन! इस हवेली में क्या कमी है। घर में बीस-पच्चीस नौकर-चाकर हैं तो पीहू दीदी को नौकरी करने की क्या जरूरत है।’’ बेला पूछ बैठी।

‘‘जिद्दी है। बचपन में कागज के जहाज बनाकर उड़ाया करती थी जब बड़ी हुई तो एयर होस्टेस की ट्रेनिंग ले ली। मेरे लाख मना करने के बावजूद वह नहीं मानी। रात को मुझे दिन भर की बातें सुनाकर पागल कर देती है।’’ हंसते हुए कहती है, ‘‘ऐसा लगता है मैं भी रोज जयपुर से सिंगापुर घूम आती हूं।’’ बेला जानती है कि दादी और दीदी दोनो दोस्त हैं। देर रात पीहू लौट कर आती है।

‘‘और शकु रानी! क्या हो रहा है?’’

‘‘क्यों शकुंतला बोलने में लाज आ रही है। अभी तक खाना नहीं खाया। चल जल्दी से हाथ-मुंह धो ले।’’

खाने के टेबल पर, ‘‘दादा जी तुम्हें इसी नाम से तो बुलाते थे। मेरी शकु…!’’ हंसकर।

‘‘आज बड़ी खुश नजर आ रही है। कोई जहाज में मिल गया क्या?’’

‘‘हां दादी! एक ऐसा लड़का मिला है जो पिछले पांच दिन से रोज फ्लाइट में बैठता है और साथ में वापस आ जाता है। कभी पानी-चाय मांग लेता है और कोई बात नहीं करता बस रास्ते भर टुकुर-टुकुर देखता रहता है।’’

‘‘देखने में कैसा है? सोच लो आजकल जमाना खराब है।’’

‘‘नहीं दादी! किसी अमीर खानदान का लड़का लगता है। शराफत नहीं होती तो अबतक बात कर लेता। चलो छोड़ो आज तुम्हारे और दादा के प्यार-मोहब्बत के किस्से सुनेंगे। तुमने भाग कर दादा से शादी की थी। भई! तुम्हारे भी क्या जलवे रहे होंगे उन दिनों। मगर भागी क्यों थी?’’

‘‘तेरे दादा गरीब परिवार से थे। मुझे ट्यूशन पढ़ाया करते थे। इसी दरम्यान हमदोनो में प्यार हो गया और जब यह खबर तेरे नाना जी को मिली तो उनका रजवाड़ा खून उबल पड़ा। उन्होंने तेरे दादा को कहा कि शहर छोड़कर चला जा नहीं तो तेरे परिवार में एक भी आदमी जीवित नहीं बचेगा। उनको जाना पड़ा। जाते हुए उन्होंने मुझसे बस एक बात कही कि शकुंतला अगर तुम मुझसे सच्चा प्यार करती हो तो थोड़ा इंतजार करना। मैं वापस आउंगा। वो सपरिवार यहां से चले गए। तेरे नाना मेरे रिश्ते के लिए हर रोज किसी न किसी को ले आते और मैं हर बार टाल जाती। समय गुजरता गया। तेरे दादा कहां थे, कैसे थे मुझे कुछ नहीं पता पर एक दिन एक बैरन चिट्ठी मिली।

‘‘यह बैरन चिट्ठी क्या होती है? इसके बोलते ही तुम्हारे चेहरे की चमक बढ़ गई।’’

‘‘वो कमाल की बैरन चिट्ठी थी जिसपर लिखा था-शकुंतला। संयोग से मुझे ही मिला जिसमें लिखा था कि शकुंतला पत्र पढ़कर फौरन मेरे बताए पते पर आ जाओ। उस वक्त मुझमें पता नहीं कहां से इतना साहस आ गया था कि मैं घर छोड़कर तेरे दादा के पास जयपुर चली गई।’’ दादी शांत हो चुकी थी।

‘‘उन दिनों यह बड़ी बात थी। तुमने तो इतिहास रच दिया शकु रानी। चलो अब सोते हैं।’’ अगले दिन पीहू जब घर आई तो थोड़ी उदास थी।

‘‘क्या बात है, आज किससे लड़कर आ रही है।’’

‘‘दादी! आज उस लड़के ने मुझसे बात की। उसने सिंगापुर में बताया कि वह रोज सिर्फ मेरे लिए ही प्लेन से आना-जाना करता है। मैंने सीधा सवाल किया कि क्यों? उसने झट से कहा कि मुझसे शादी करना चाहता है। मैं हैरान रह गई। कुछ बोल नहीं पायी। तुम्हीं बताओ क्या जवाब दूं।’’

‘‘इसमें इतना परेशान होने वाली कोई बात नहीं है। उसे बोलो कि थोड़ा इंतजार करे।’’

‘‘इससे क्या होगा?’’

‘‘तुम बोल देना। बाकी समय आने पर खुद समझ जाओगी। अगर इंतजार कर लेगा तो वह प्यार भी करेगा। अपनी दादी को देख ले।’’ पीहू दादी के कंधे पर लेट गई। अगले दिन वह लड़का पीहू से मिलता है और काॅफी पीने का आग्रह करता है।

‘‘क्या करते हैं आप?’’ पीहू ने पूछा।

‘‘आर्किटेक्ट हूं। जयपुर के कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा हूं। दादी ने क्या कहा?’’

‘‘दादी मेरे लिए माता-पिता है। यह जीवन ही उसका दिया हुआ है। हां! अभी हमलोग मिले हैं। ऐसे फैसले लेने में थोड़ा वक्त तो लगेगा। आपको मंजूर है।’’

‘‘क्यों नहीं। पूरा वक्त लीजिए। लेकिन कभी-कभी प्लेन के बाहर भी हमसे मिलें तो अच्छा लगेगा।’’ दोनो हंसते हुए चल देते हंै। कुछ महीनों के बाद पीहू को वरूण की याद आती है। वह उसके बताए पते पर पहुंचती है। मकान के बाहर किसी बिल्डर का बोर्ड लगा था। वह हिम्मत कर अंदर जाती है जहां वरूण एक लड़की के साथ सोफे पर लेटा मिलता है।

‘‘हमारी बूढ़ी दादी ठीक कहती है कि जिस प्यार में इंतजार न हो वह प्यार हो ही नहीं सकता। गुडबाॅय मिस्टर वरूण। मुबारक हो।’’ इतना कह वह तेज कदमों से चल पड़ती है। 

    लेखकः मनोज सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार)

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