पंख बिना परवाज़

खाने की पोटली और धान काटने वाली दंतिया लिए दोनो बहनें धीरे-धीरे अपने खेतों की ओर बातें करते बढ़े जा रही थी जहां उनके मां-बाप सुबह से काम में लगे हुए थे।

‘‘जमींदार की बेटियां जब भी अपनी सहेलियों के साथ हमारे घर के आगे से निकलती हैं तो कितना हंसती हैं। तुमने देखा है।’’ बड़ी बहन उर्मिला ने छोटी बहन शर्मिला से कहा।

‘‘हां! बात-बात पर जोर से खिलखिलाती हैं। मां कहती है कि बड़े घर की बेटियां हैं, वो कुछ भी कर सकती हैं।’’

‘‘पर हम हंसते हैं तो डांट देती है। ऐसे ही-ही मत किया कर बेटी जात को शोभा नहीं देती। बड़ी होती जा रही हो।’’

‘‘वो भी तो बड़ी हो रही हैं। चंपा चाची कह रही थी कि जमींदार की बड़ी बेटी रेवती और हम एक ही दिन जन्में हैं। चाची ने यह भी बताया कि वो तेरे से लंबी दिखती है। बड़े घर का खान-पान ही अलग होता है न! जाने दो हमें क्या।’’ दोनो बहने बातें करते पगडंडियों से गुजरती अपने खेत पर पहुंचती हैं।

‘‘पगली! इतनी देर कर दी। चल जल्दी से खाना निकाल।’’ दुलारी गमछा बिछाकर खाने की पोटली खोलती है। खाते हुए बाप को हाथ पंखे से छोटी बेटी शर्मिला हवा करती है। फिर मेघन और दुलारी अपने काम पर लग जाते हैं। दोनो बेटियां भी धान काटने में अपने माता-पिता का हाथ बटाने लगती हैं।

‘‘अरे! उर्मि बर्तन मांज आई। घर पहुंचकर अपने से काम नहीं होता।’’ दुलारी बोल पड़ी।

‘‘हमने घर का सारा काम कर दिया है। तुम्हारी लाड़ो तो बस सजने-संवरने में लगी रही।’’ शर्मिला के इतना कहने पर दोनो बहनें उलझ जाती हैं।

‘‘अभी से काम नहीं सीखेगी तो ससुराल में गाली-बात खाएगी।’’

‘‘मुझे कहीं नहीं जाना। तुमलोगों ने पढ़ने नहीं दिया। मेरी उम्र की जमींदार की बेटी को देखो तो कैसे पढ़-लिख रही है।’’

‘‘तू उनकी बराबरी करेगी। तेरा बाप मजूर है उनका।’’ दुलारी आंखें दिखाती है और कटे हुए धान की फसल को सभी अपने माथे पर उठाकर चल पड़ते हैं। अगले दिन मेघन और दुलारी को जमींदार के घर जरूरी काम से जाना पड़ता है इसलिए खेत पर दोनो बहनें ही काम करने आई थी। उनके साथ वाले खेत में चंपा चाची भी काम कर रही थी। बीच-बीच में वे आपस में बात भी करते थे। दोपहर में वे सभी पेड़ की छांव में खाना खा रहे होते हैं कि उनकी नजर दूर से जाती हुई जमींदार की बेटियों पर पड़ती है।

‘‘चाची! देख रही हो। कितनी खुश हैं।’’

‘‘बेटी! ये जवानी की हंसी है। यह वह समय होता है जब बिना बात की भी हंसी आती है पर हमलोग कब जवान और कब बूढ़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। पूरी उम्र बस खाने-कमाने में गुजर जाता है।’’ चंपा ने अपना अनुभव सुनाया।

‘‘पिछले साल मुझे भी जोर की हंसी आई थी चाची!’’ यह बोलकर उर्मिला जोर-जोर से हंसने लगी। उसको इस तरह हंसते देख शर्मिला और चंपा भी हंसने लगे। उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि उनकी इस लापरवाह हंसी को जमींदार का बेटा और उसके साथी दूर से देख रहे थे।  

‘‘अरी ओ! बड़ी हंसी आ रही है। काम में मन नहीं लगता। हमने आधे फसल पर काम दिया है तुम्हारे बाप को।’’

‘‘छोटे सरकार! गलती हो गई। बच्ची है नहीं जानती। माफ कर दीजिए।’’ चंपा गिड़गिड़ाने लगी।

‘‘ठीक है! इसे कल हवेली भेज देना।’’ उसने उर्मिला की तरफ इशारा किया। मां-बापू से पूछकर उर्मिला हवेली जाती है जहां उसकी मुलाकात जमींदार की बड़ी बेटी रेवती से होती है।

‘‘तेरे कपड़े कई जगह से फटे हैं। क्या नाम है तुम्हारा?

‘‘दीदी! इससे अच्छे नहीं हैं मेरे पास।’’ उर्मिला नजर झुका लेती है।

‘‘कोई बात नहीं। मेरे कपड़े तुम्हें फिट आयेंगे। पहन लो क्योंकि आज घर में कुछ लोग आने वाले हैं। जन्म दिन है हमारा।’’ रेवती उसे अपने कपड़े देती है। पार्टी शुरू होते ही रेवती की एक सहेली उर्मिला को देख आश्चर्य से बोल पड़ी, ‘‘अरे! कितनी सुंदर है तेरी नौकरानी।’’ बाकी लोग भी तारीफ करते हैं लेकिन सबसे अधिक हैरान तो उर्मिला थी जिसने जीवन में पहली दफा ऐसा जश्न देखा। इतने करीब से रेवती की सहेलियों को इठलाती देख उसके अरमान भी मचल उठे। तभी उसकी मां वहां आ जाती है जिसे हवेली की मालकिन ने बुलाया था।

‘‘यह सारा सामान अपने घर ले जाओ। तुम्हारी बेटी अच्छी है। कभी-कभी इसे भेज दिया करो, रेवती का मन लगा रहेगा।’’ मालकिन ने मिठाई और कई सामान दिए जिसे पाकर दुलारी गदगद हो उठी।

‘‘क्या हो गया तुझे। अचानक गूंगी क्यों हो गई। तुझे तो खुश होना चाहिए कि आज बड़ी मालकिन ने हम गरीबों को इतना मान दिया।’’ रास्ते मे चलते हुए मां बोली। 

‘‘अम्मा! तुम तो कह रही थी कि हम और रेवती दीदी एक ही दिन जन्में थे। क्या यह सच है?’’

‘‘हां! उस दिन बरसात हो रही थी। तू गौशाला में जन्मी थी और मालकिन उसी दिन शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती हुई थी।’’ दुलारी को पुरानी बातों को याद कर हंस पड़ी, ‘‘पर तू यह बात क्यों पूछ रही है।’’

‘‘इस तरह मेरा भी जन्म दिन आज ही है न अम्मा!’’ बुझी आवाज से उर्मिला ने पूछा। दुलारी भावुक हो उठी।

‘‘गरीबों का जन्म-मरण सब एक समान होता है बेटा! ये सब बड़े लोगों के चोंचले हैं। हमलोग जिस दिन अच्छा खाना खा लेते हैं वही दिन हमारे लिए दशहरा-दीवाली बन जाता है।’’ मां की बातें सुन उर्मिला के उठते कदम अचानक लड़खड़ाने लगते हैं मानो उसकी उमंगों की डोर को किसी ने जोर से नीचे जमीन की ओर खींच दिया हो।    

लेखकः मनोज सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार) 

© लेखक एवं The NGO Times

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