पांडेजी की अधूरी प्रेमकथा

बलिया के जयबीर पांडेय उर्फ पांडेजी अपने विनोदी स्वाभाव की वजह से अपने दोस्तों में हमेशा लोकप्रिय रहे।

भोजपुरी उनकी मातृभाषा थी जिसका प्रयोग वह खुलकर करते थे, चाहे सामने वाला समझे या नहीं। सबको हंसाने वाले पांडेजी उस समय सीरियस हो गए जब दिल्ली के विद्युत विभाग ;डेसूद्ध में जूनियर इंजीनियर के तौर पर बहाली हुई और फटाफट उनकी शादी कर दी गई। आॅफिस से छुट्टी मिली नहीं इसलिए शादी के अगले दिन ही बलिया छोड़ना पड़ा। दिल के सारे अरमान धरे रह गए। अपनी नई नवेली दुल्हन से बात भी नहीं कर पाए। परिवार में रिश्तेदारों की लंबी-चैड़ी फौज ने एक क्षण के लिए भी दुल्हन को अकेला नहीं छोड़ा। एक अमिट खीझ लिए नौकरी करनी पड़ रही थी। ऐसे में कोई साथी उन्हें छेड़ता था या पार्टी की डिमांड करता था तो उनकी देशी झाड़ सहनी पड़ती थी।

‘‘और तोहनी के कौउनो गप्प न सूझेला। मुंहों नईखी देखले अभी ले अउर तोहार के पार्टी चाहीं। हमार त किस्मते फूट गईल बा।’’ पांडे दोस्तों की चुहलबाजी का हर दिन शिकार होने लगा।

दिल्ली के जनकपुरी में दो अदद दोस्त आलोक और राकेश गुप्ता के साथ एक ही कमरे में पांडेजी रहते थे। दोनो डेसू के ही कर्मचारी थे जिनके साथ वे इस दर्द का साझा करते थे।

‘‘का बताईं हो, तोहार भौजी के बड़ा याद आ रहल बा। उ फोनों नईखे करत, लेकिन बात त इहो बा कि उ बेचारी का पास त फोनांे नईखे, त उ करी त कैसे करी।’’ फिर उन्होंने बताया कि शादी अगले दिन ही उनकी पत्नी मायके प्रतापगढ़ चली गई। भाई आया था उसे लिवाने। अब कोई शुभ मुहूर्त निकलेगा तभी वो इनके घर बलिया आ पायेगी। यानि गवना के उपरांत ही पांडेजी का मिलन अपनी नवविवाहित पत्नी से हो पाएगा।

कुछ महीनों के उपरांत। एक दिन घर से फोन आया कि छोटा भाई डब्बू उनकी पत्नी को लिवाने उनके ससुराल गया है। खबर सुनते ही पांडेजी के तन बदन में आग लग गई।

‘‘केकरो कुछ नईखे बुझात, हमरा के बतावल भी जरूरो ना समझल गईल, कम से कम हम आ त जैएतीं, उ त अभी लइका बा, वोकरा का बुझाई, पता ना रस्ता पैरा वोकरा कौउनो दिक्कत होई त, उ कैसे का करी।’’ अपने पिता को झिड़कते हुए फोन पर कहा। दरअसल उन्हें लगा कि यह मौका भी हाथ से गया। उधर पिताजी ने समझाया कि तुम अपने काम पर ध्यान दो। जब छुट्टी मिले तो आना। हड़बड़ी मचाने की कोई जरूरत नहीं है। अब पांडेजी ही जानते थे कि उनपर क्या गुजर रही है। सारे लोग उन्हें दुश्मन की तरह दिख रहे थे।

उनकी हालत पर तरस खाकर आलोक ने उनके हिस्से की ड्यूटी करने फैसला कर लिया और उन्हें दो दिनों की आकस्मिक छुट्टी दिला दी। पांडेजी कुलांचे भरते बलिया पहंुच गए। अपेक्षा के अनुरूप कोई भी उनका स्वागत नहीं कर रहा था। एक अनचाहे गेस्ट की भांति अपने ही घर में रहना काफी खल रहा था क्योंकि परिवार के सारे सदस्य नई दुल्हन के इर्द-गिर्द मंडरा रहे थे। ड्योढ़ी पर ही दादाजी अपने चिरपरिचित हुक्के के साथ खाट पर बैठे मिल गए। काफी टाईम ले लिया उन्होंने और बेसब्र पांडेजी सिर्फ ताक-झांक करते रहे। छोटी बहन ने हंसते हुए पूछा, ‘‘भैया! भाभी से नहीं मिलोगे?’’

पांडेजी की बांछें खिल गई। अपनी दुल्हन को पहली बार देख रहे थे। सचमुच वह बहुत सुंदर थी। घूंघट से मुंह ढंक रखा था।

‘‘तनी अपन मुंहवा से अब त पर्दावअ हटावअ! हम तोहार सास नईखी, जे पर्दा करत बारू।’’ उनकी इस बात पर वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। नयना नाम था दुल्हन का। थोड़ा समय मिला। जान पहचान हुई और खुराफाती पांडेजी ने रात में मिलने की योजना बना डाली। नयना घर के पुराने रीति-रिवाजों से परिचित हो चुकी थी। घर का कुछ हिस्सा अभी भी मिट्टी से बना था। अंदर के कमरों में घुप्प अंधेरा छाया रहता था। आखिरकार दादी ने रात का कठोर फैसला सुना दिया। बहू के साथ पांडेजी की बहन सोयेगी और बाकी सारे लोग दालान में सोयेंगे। पांडेजी दहल गए परंतु हिम्मत नहीं हो रही थी कि दादी के खिलाफ आवाज उठाये। पर कोशिश नहीं छोड़ी बंदे ने। नयना को धीरे से कहा कि आधी रात में मेरी खाट के पास आकर अपनी पायल बजा देना। वह राजी हो गई। यह स्कीम भी काम नहीं आई। पांडेजी की किस्मत ने उस समय साथ नहीं दिया जब नयना की पायल बजी और साथ सो रहे दादाजी जोर-जोर से खांसने लगे। वह उल्टे पैर भागी। यह थी ग्रामीण संयुक्त परिवार की मर्यादा।

अगली सुबह पांडेजी ने नयना से कहा, ‘‘एतना जोर से पायल बजावल जाला का! आज तनि धीरहंईं बजईहा समझलअ।’’

कल सुबह पांडेजी को दिल्ली भी लौटना था अतः आज की रात ज्यादा बेचैनी थी। बाहर ठंठ़ी हवा के झोंके चल रहे थे। पांडेजी की आंख कब लगी पता ही न चला। नयना आई। पायल बजाई परंतु वह नींद से नहीं जागे। अगली सुबह सबसे पहले तो नयना को डांटा, ‘‘एतना धीमे भी बजावे के ना कहनीं ह कि आवाजे ना सुनाई पड़े।’’ फिर पांडे ने घर में कोहराम मचा दिया।

‘‘आज हम जा रहल बानी। अउर नयनी भी साथे जईहैं। हमरा ड्यूटी से अईला के बाद खाये-पीये में दिक्कत होला।’’

‘‘वो तो पहले भी हो रही थी। आज ऐसा क्या हो गया। अभी पंडितजी आने वाले हैं यदि दिन निकलेगा तो साथ जाएगी।’’ माता जी ने समझाने का प्रयास किया। पंडित जी की गहरी छान-बीन के बाद शुभ मुहूर्त निकला पांच दिन के बाद। बस फिर क्या था पिताजी ने तपाक से अपना फैसला सुना दिया। ‘‘अभी तुम जाओ। आज से ठीक पांच दिन बाद डब्बू दुल्हिन को लेकर दिल्ली चला जाएगा।’’

अततः पांडेजी को मनमसोस कर अकेले ही सफर पर निकलना पड़ा। रास्ते भर नयना के पायल की मीठी झंकार को महसूस कर यह सोचते रहे कि काश! इसकी टाईमिंग सही हो गई होती तो उनकी अधूरी प्रेम कथा को भी नए पंख मिल गए होते।

लेखकः मनोज सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार)

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