पंडारा रोड का सबक

‘‘साहब! मुझे जाना होगा। अर्जेंट काॅल है घर से।’’ सलीम दिल्ली के व्यस्त पंडारा रोड पर अचानक गाड़ी रोककर बोलता है।

‘क्या हो गया। नमाज के लिए जाना है तो यहीं पास में कोई मस्जिद देख ले।’’ दोपहर होने की वजह से विशाल ने कहा।

‘‘नहीं साहब! बीबी बुला रही है।’’

‘‘सब ठीक तो है। अभी घर से ही तो आए हो।’’

‘‘जी सर! ये मेरी दूसरी घरवाली का फोन है। दो दिन से उसके पास नहीं गया हूं। आज नहीं गया तो कुछ कर डालेगी।’’ गाड़ी की चाबी निकालकर उसने विशाल की तरफ बढ़ा दिया।

‘‘तुम चार साल से मेरी गाड़ी चला रहे हो कभी बताया नहीं और आज ऐसी क्या बात हो गई। मुझे आॅफिस पहुंचा कर चले जाना। तुम जानते हो मुझे गाड़ी चलानी नहीं आती। ऐसे में इस रोड पर क्या करूंगा।’’

‘‘आप नहीं समझेंगे। नहीं गया तो जीना मुश्किल हो जायेगा।’’

‘‘और मुझे बीच सड़क पर छोड़ गए तो तेरी नौकरी जाएगी।’’ विशाल को गुस्सा आ गया।

‘‘कोई बात नहीं। आप मालिक हैं। कुछ कर लूंगा मगर उसकी नाराजगी बर्दाश्त नहीं।’’
‘‘इतना प्यार करते हो। वो भी दूसरी बीबी से। ताज्जुब है। इतनी सैलरी में दो बीबी कैसे अफोर्ड करते हो भाई। हम तो एक ही संभालने में लगे हैं।’’ विशाल को सलीम की बातें दिलचस्प लगी।

‘‘प्यार-मोहब्बत आप बड़े लोग कहां समझ पायेंगे-साहब!’’

‘‘तू ज्यादा समझता है तो हमें भी समझा दे। इतनी कम उम्र में दो शादियां कर ली इसमें प्यार कहां है। जरूरत को प्यार नहीं कहते बेटे।’’ विशाल उसे बातों में उलझाना चाहा।

‘‘पहली शादी अब्बा ने कर दी दूसरी वाली मेरा असली प्यार है। ड्राइविंग मैंने रूखसाना के बाप से ही सीखी जो मुझे मार-मारकर सिखाते थे। उस समय रूखसाना मुझे बचाती और बाप से छुपकर खाना भी खिलाती थी। उसका बाप यानि मेरा उस्ताद एक एक्सीडेंट में मर गया। अकेली रूखसाना को मैंने अपना लिया।’’ कुछ रूककर, ‘‘बाबूजी! प्यार जितनी बार करोगे-उतनी बार हो जाएगा।’’
‘‘हर बार हो जाएगा!’’ विशाल ने दोहराया।

‘‘हां साहब! आजमा कर देख लेना।’’ उसकी इस बात पर विशाल गंभीर हो गया। उसने कार की चाबी सलीम को देते हुए कहा, ‘‘मैं यहीं वेट करता हूं। त्रिलोकपुरी ही तो जाओगे। जल्दी आओ।’’ विशाल वहीं एक रेस्टोरेंट में बैठकर काॅफी आर्डर करता है।

सोचने लगा कि उसने कितनी बार प्यार किया। उषा उसकी क्लासफेलो थी मगर कभी उससे बात करने की हिम्मत नहीं होती। एक बार वह ट्यूशन पढ़कर लौट रही थी और जोर की बारिश आ गई। मेरे पास छतरी थी। मेरे आॅफर को उसने एक्सेप्ट कर लिया और वह मेरा पहला प्यार बन गई। मगर उसके क्षत्रिय बाप को यह पसंद नहीं आया। अगले ही साल उसकी शादी कर दी। शादी में हमारा परिवार भी इनवाइटेड था। मैं पेट दर्द का बहाना कर शादी में शामिल नहीं हुआ। हां! बैंड-बाजे की आवाज मजबूरी में सुनता रहा।

दूसरी दफा एक बंगाली बाला से प्यार हो गया। घर में एक आयोजन था। पड़ोस में रहने वाली पुष्पा भी शामिल हुई। वह बेहद खूबसूरत थी। हंसती तो मोती झड़ते थे। माहौल अंताक्षरी का बन गया। घरवालों की जिद पर मैंने भी भाग लिया। जाते समय पुष्पा मेरे पास आकर बोली कि मेरी आवाज बड़ी अच्छी है। कई बार बोल गई। मुझे भी पहली बार ही पता चला कि मेरी आवाज अच्छी है। दीवानगी सिर चढ़कर बोलने लगी। रात भर सो नहीं पाया। अगली सुबह उसके घर पहुंच गया। उसके साथ समय बिताया। फिल्म देखी। मगर आंख तब खुली जब उसे किसी दूसरे के साथ भी फिल्म जाते देखा। उसकी सहेली ने बताया कि पुष्पा एक जगह टिकने वाली नहीं है। बंगाल के एक डाॅक्टर से उसके रिश्ते की बात चल रही है। मेरा दूसरा प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका।

शादी से कुछ दिनो पहले तीसरी दफा भी प्यार के चक्कर में पड़ गया। रूही नाम था उसका। जब साफ्टवेयर इंजीनियरिंग बैंगलोर में कर रहा था तो उसके ही मकान में किरायेदार था। घर से दूर जब किसी का खूबसूरत सहारा मिला तो काफी अच्छा लगा। यह मेरा मैच्योरिटी वाला प्यार था इसलिए नतीजे आने की पूरी संभावना थी। शादी के प्रस्ताव पर रूही ने जो बात कही उससे मेरा दिल ही टूट गया। उसने कहा कि वह माॅडल बनना चाहती है। उसके इस कैरियर में मैं या मेरा परिवार दखलअंदाजी नहीं करेंगे। साथ ही उसे बच्चे भी नहीं चाहिए क्योंकि फीगर का सवाल आता है। नतीजा पता चलते ही मैंने कमरा बदल दिया।

शादी के बाद एक बार फिर एक तीखे नयन-नख्श वाली सेक्रेटरी मोना से इश्क कर बैठा। टेबल सजाने से लेकर खाने तक का ध्यान रखती थी मेरा। सबके चले जाने के बाद वह मेरे साथ ही आॅफिस से निकलती थी। उसे रास्ते में ड्राॅप करते हुए एक दिन मैंने उससे कहा कि मुझे उससे प्यार होने लगा है। मुझे नहीं मालूम था कि वह तो इसके लिए जैसे पहले से तैयार बैठी थी। छूटते ही बोली कि उसे कोई एतराज नहीं है। बस उसकी एक ही शत्र्त थी कि मैं अपनी पत्नी से तलाक ले लूं। मैं शाॅक्ड था।

उस दिन व्यथित होकर घर लौटा। आते ही पत्नी ने चाय टेबल पर रख दी। पूछा कि कोई परेशानी तो नहीं। मैं नकली हंसी हंसने लगा। उसी समय बेटी खिसककर गोद में बैठ गई। उस रात नींद नहीं आई। पास में पत्नी सो रही थी। बेखबर। मेरी हरकतों से बेपरवाह। ऐसा लग रहा था कि दुनिया की सारी दौलत और खुशी उसी के पास है। अपनी छोटी सी दुनिया में मस्त। मुझे याद है कि उस दिन के बाद मैंने कभी भी किसी से दिल लगाने की जुर्रत नहीं की।

सलीम वापस गाड़ी लेकर आ गया था। आज पंडारा रोड की घटना ने एक ऐसा सबक दिया था जिसे विशाल जीवन भर नहीं भूल पाया। उसे समझ आ गया था कि सच्चा प्यार क्या है! एक पत्नी ही है जो बिना किसी टर्म-कंडिशन के अपने पति और उसके परिवार पर जान लुटा सकती है। सलीम ठीक कहता है-प्यार हर बार हो सकता है पर बगैर किसी शत्र्त के हो जाय तो प्यार-प्यार है वरना सब बेकार है।

लेखकः मनोज सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार)

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