दर्द बिना भी क्या जीना

 ‘‘रामेश्वर! तुम कोई दूसरा वकील देख लो। मेरे पास परेशानी हो रही होगी।’’

‘‘किसने कह दिया कि मैं परेशान हूं। मैंने तो नहीं कहा साहब!’’

‘‘तुम कहो या न कहो। परिवार वाले हो, मैं समय पर तन्ख्वाह नहीं दे पाता।’’ वकील दीपक शर्मा ने संजीदा होकर अपने मुंशी से कहा। दरअसल दीपक अपने दिवगंत पिता की वजह से वकील बना मगर हार्ड कोर वकील नहीं बन पाया। बूढ़ी मां और दो अविवाहित बहनों के साथ रामेश्वर भी उसकी जिम्मेवारी  भी दीपक पर थी जो अर्से से उसका साथ निभा रहा था।

‘‘साहब! देर-सवेर पैसे तो मिल ही जाते हैं और आप इतना ध्यान रखते हैं-यह क्या कम है। चलिए देर हो रही है एक क्लाइंट इंतजार कर रहा होगा।’’ दीपक ने अपने पुराने स्कूटर में किक मारकर स्टार्ट किया और मुंशी रामेश्वर पीछे बैठ गया। आज का केस एक बेटे का अपने सगे बाप से था जिसने दूसरी शादी कर उसेे अपनी संपत्ति से बेदखल कर रहा था। दीपक बेटे का वकील था। कोर्ट की कार्रवाई शुरू होने से पहले ही उसने बाप-बेटे का समझौता करा दिया।

‘‘सर! इस तरह हर क्लाइंट का हम लोग भावनात्मक समझौता कराते रहे तो फीस कौन देगा। दोनो बाप-बेटे तो बिना एक पैसे दिए चले गए।’’ रामेश्वर अपनी नाराजगी जताता है।

‘‘यार! बेटा आॅटो चलाता है। मेरी फीस कहां से दे पाता फिर बाप-बेटे की लड़ाई, अच्छी नहीं लगती। जाओ चाय बोल दो।’’ दीपक अपने फैसले से खुश था।

‘‘कुछ खाने का लाउं? मुझे तो भूख लगी है।’’

‘‘नहीं! सिर्फ चाय और तुम लंच कर लो।’’ पचास रूपये का एक नोट पकड़ाते हुए कहा। मुंशी दीपक की दरियादिली का कायल तो था परंतु वह जानता था कि इस तरह जीवन चलाना बेहद मुश्किल है। उस रात मुंशी को दीपक के घर वाले आॅफिस में ही रूकना पड़ा। एक नया केस मिला था, उसके डाक्यूमेंट्स तैयार करने थे। देर रात अचानक दीपक बोल पड़ा, ‘‘अरे! मुंशीजी तुम्हें भूख नहीं लगी क्या? मेरे घर से खाना आया है, खा लो।’’

‘‘और आप क्या खायेंगे? खाना तो एक ही आदमी के लिए है।’’

‘‘मुझे भूख नहीं है। खाने के बाद मेरे लिए चाय बना देना।’’ दीपक अपनी फाइलों में उलझते हुए बोला। रामेश्वर को ध्यान आया कि वकील साहब ने दिन में भी कुछ नहीं खाया था।

‘‘साहब! कुछ तो खा लेते। इतनी रात को बाहर से भी कुछ नहीं आ सकता।’’ अफसोस करने लगा।

‘‘मुंशीजी! मैंने पिछले दो दिन से खाना नहीं खाया। मेरी मां ने ताना दिया कि मैं बड़ी बहन की कमाई खाता हूं, इसलिए घर में खाना छोड़ दिया। पास में पैसे थे वो खर्च हो गए। वैसे भी दुनिया के चलन देखने के बाद भूख कहां लगती है।’’ कुर्सी पर पैर फैलाते हुए दीपक बोला।

‘‘सर! मांजी ने ऐसा क्यों कहा। आप कितना ख्याल रखते हैं सबका।’’ रामेश्वर हतप्रभ था।

‘‘मेरी दोनो बहनें अपने तरीके से जीना चाहती हैं। बड़ी बहन शैलजा को उसके ब्वाय फ्रेंड ने एक फैक्टरी में नौकरी लगवा दी। मैंने एतराज किया तो दोनो बहनों ने मां को भड़का दिया। छोटी शालू भी बेलगाम होती जा रही है। क्या करूं पैसे आए तो इनकी शादी-ब्याह कर दूं।’’ दीपक ने खुलकर अपनी बात मुंशी को बतायी। रामेश्वर हैरत में था।

‘‘मुंशीजी! जीवन में कई दर्द होते हैं, जिन्हें पालना पड़ता है।’’

‘‘साहब! आप कैसे झेलते हैं-यह सब।’’

‘‘बिना दर्द के भी लोग जिंदगी जीते हैं क्या? मैं तो नहीं जी पाउंगा, आदत जो पड़ गई है।’’ जोर से हंस पड़ा दीपक।

रामेश्वर और दीपक कोर्ट पहुंचते हैं जहां रत्ना उनका इंतजार कर रही थी। शादी के एक साल ही हुए थे और अपने पति से छुटकारा पाने के लिए कचहरी का दरवाजा खटखटा रही थी। दीपक और रत्ना की बातों की बातों को सुनने के बाद रामेश्वर को अंदाजा होने लगा था कि वकील साहब इस केस को भी फ्री में ही निपटायेंगे। हुआ भी वही। रत्ना का तलाक हो गया और वह आजाद होकर वकील साहब के आॅफिस अपने दूधमुंहें बच्चे के साथ आ गई।

‘‘मेरे पास इस शहर में रहने का कोई ठिकाना नहीं है। क्या आज रात मैं अपने बच्चे साथ यहां गुजार सकती हूं।’’ रत्ना ने दीपक से आग्रह किया। वकील साहब ने इजाजत दे दी। अगली सुबह रामेश्वर ने जल्दी आकर आॅफिस खोला तो देखा रत्ना अपने बच्चे को छोड़कर कहीं जा चुकी थी। टेबल पर दीपक के नाम एक पत्र रखा था जिसे पढ़कर वह हैरान रह गया। ‘‘वकील साहब! आप अच्छे इंसान हैं। मैं अपने बच्चे को छोड़कर अपने पूर्व प्रेमी के पास जा रही हूं। अब आप इस बच्चे को चाहें तो अपना लें या किसी अनाथालय में छोड़ दें। क्षमा चाहती हूं।’’

‘‘लो जी! दर्द की एक और सौगात मिल गई।’’ रामेश्वर ने खीजते हुए कहा। दीपक गंभीर था। वह बच्चे को लेकर एक क्रेच में गया और वहां की हेड मिस्ट्रेस को सारा खर्च देकर इसकी देखभाल की जिम्मेदारी सौंप दी।

‘‘पहले भी हजार मुसीबतें थी, एक और गले पड़ गई। चितरंजन पार्क चलना है। एक अमीर बुढ़िया अपने ही बेटी दामाद से परेशान है।’’ वहां पहुंचकर उनकी आंखें आश्चर्य से फटी रह जाती हैं। उस बूढ़ी औरत को घर से बाहर निकाल दिया था सगी बेटी-दामाद ने। वे चाहते थे कि करोड़ रूपए वाली कोठी उनके नाम कर दे।

‘‘बेटे! मैं इस उम्र में धन-दौलत का क्या करूंगी। मुझे तो बस दो जून की रोटी चाहिए और सिर पर छत। मैं इनके नाम पर कर भी देती मगर ये इतना भी जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं है। पिछले एक साल से भीख मांगकर गुजारा कर रही हूं।’’ यह बोलते हुए उसकी आंखों से झर-झर आंसूं बहने लगे। दीपक ने उसे पास के एक अस्पताल में भर्ती करा दिया क्यांेकि उसके दामाद ने घर से निकालने के क्रम में ऐसा धक्का मारा था जिससे उसकी कोहनी टूट गई थी। दीपक ने केस स्टडी की और उस लाचार बुढ़िया की कोठी दिलाकर जब चलने लगा तो वह औरत बोल पड़ी।

‘‘बेटे! तुमने एक भिखारन को फिर से महल में बिठा दिया। अपनी फीस नहीं लोगे?’’

हंसते हुए दीपक बोला, ‘‘रहने दो मांजी। अपना आर्शीवाद दे दो वही काफी है।’’

‘‘इस कोठी का मैं क्या करूंगी। पहले भी कह चुकी हूं कि मुझे तो बस एक आसरा चाहिए वह तुमने दे दिया। अब इसके मालिक तुम हो। यही है तुम्हारी फीस। सिर्फ अंतिम सांस मैं इसी घर में काटना चाहती हूं क्योंकि यह मेरे पति की निशानी है।’’ दीपक उसे गले लगाकर बोलता है।

‘‘मांजी! आपने यह कहकर जो प्यार दिया है, वह बहुत है मेरे लिए। आपके रहने-सहने का पूरा इंतजाम आज से हम करेंगे। आप अपने पति की यादों के साथ इसी मकान में रहें।’’ यह कहकर वह स्कूटर पर बैठ जाता है। रास्ते में रामेश्वर भावुक हो उठा, ‘‘कुछ दर्द इतने मीठे भी होते हैं-आज देख लिया सर! आप इसी तरह बने रहें। संसार में आप जैसे लोगों की बड़ी कमी है साहब!’’ दोनो हंसते हुए चल पड़ते हैं।

लेखकः मनोज सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार)

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