धर्मयुद्ध (नाटक)

पृष्ठभूमि

मन्दिर पृष्ठभूमि में विद्यमान है ।एक तरफ जंगल दिखाई दे रहा है ।दूसरी तरफ ग्राम्य-जीवन की झलक दिखलाई पर रही है ।

पर्दा खुलते ही एक नौजवान मंदिर के पास खड़े होकर भगवान की तस्वीर को प्रणाम करता हुआ दिखाई देता है। तस्वीर को प्रणाम कर वो मंच के दूसरे कोने की ओर की ओर बढ़ता है। चेहरे पर एक चिर-शांति दिखाई दे रही है । मंच पर खड़ा दूसरा व्यक्ति शांत भाव से उसे देख रहा है। दूसरा व्यक्ति परदेसी है ,वह किसी गूढ़ विषय पर पहले व्यक्ति से बात करना चाहता है ।

पहला दृश्य

(नेपथ्य से स्वर)
है भय क्रांत ये जग सारा भू पर अब चिर-शांति कहाँ ।
जब महाकाल खुद समरपति बने फिर धर्मयुद्ध से कौन बचे ।।
(मंच पर सूत्रधार का प्रवेश)
सूत्रधार :- (नेपथ्य की ओर देखकर)
देविका!, कहाँ हो आख़िर. . .इधर आओ न!
देविका :- (दूसरी ओर से प्रवेश करती है।)
आर्य!, मैं इधर हूँ,. . .आपके सामने।
सूत्रधार :- ओह! (घूमकर)
देविका!, तांत्रिक सभ्यता की माया में कहीं हम अपने देश के गौरवशाली अतीत को बिल्कुल ही न भुला दें, इसलिए कोई मधुर गीत अथवा वंदना गाकर हमें सावधान करो।
देविका :- सत्य कह रहे हैं, आर्य! आज अपने अतीत से साक्षात्कार करने की अतीव आवश्यकता है।. . . महाकाल सदा-शिव की महिमा को लक्ष्य कर एक गीत प्रस्तुत है।
शिव जटा जूट वारे, गले मुण्ड माल धारे,
लिपटे भुजंग कारे, जाके नंदिगण बैठे हैं दुवारे |
ऋषि मुनि भक्तजन संतन के, सदा शिव रहे सहायक,
बालेश्वर से ज्ञानी और गौरी के प्यारे हैं |
दानी हैं औघड़ हैं,दाता के विधाता हैं,
भक्तन की त्रिविध ताप दुःख सकल टाले हैं |
संकट के साथी हैं ,और जीवन के दाता हैं |
जब बजे डमरू तो भय –पीड़ा दूर भागे है |
सूत्रधार :- वाह क्या अद्भुत गीत है . . .सत्य के बहुत ही समीप है ! हमारी संस्कृति की यह निचोड़ है ।शिव की महिमा अपरम्पार है . . .मुझे एक कथा स्मरण हो आई है।
देविका :- ‘सत्यं शिवं सुन्दरम् ‘. . .पर आज भी प्रत्येक भारतवासी का अटूट विश्वास है। मैं कहानी सुनने के लिए उत्सुक हूँ, आर्य! . . .और, यह कथा तो है भी इतनी रोचक कि चाहे जितनी बार सुनी जाए बासी नहीं होती, वरंच हर बार श्रवण की पिपासा को द्विगुणित कर देती है।
सूत्रधार :- तो सुनो, कैलाशहर जनपद की कहानी! . . .कैलाशहर में एक एक विशाल शिवालय था –महाकालपुरम्। यथा नाम तथा यश . . .
(पटाक्षेप)

दूसरा दृश्य

(ग्राम मंदिर प्रांगण का दृश्य। आर्य वीरभद्र सम्मुख हैं दूत के ।दूत ने महाकालपुरम् की वस्तु-स्थिति से आर्य वीरभद्र को अवगत कराया। दोनों चिंतित मुद्रा में शून्य को निहार रहे हैं । पार्श्व में एक गीत सुनाई दे रहा है ।
गीत
है यह व्यथा बड़ा करुण !
यवनों का है यह षड्यंत्र!!
खड्ग तीर अब कुंद नहीं !
मृत्यु है अब सहचरी !!
यह काल समर्पित महाकाल को ।
जो शिव पताका यह अब उठाये!!
नवकाल अब वो कहलाये ।
मुक्त चित प्राण तजो!
है यह अब बलिदानी वेला !!
शुद्ध चित से धर्म सजो!
महाकाल की वंदना हम करें !!
शिव ही आन है।
शिव ही बान है।
शिव से ही हमारी
खिली शान है।।
मुक्त मन से गीत सजो !
शिव की वंदना हम करें!!
शुद्ध मन से शिव भजो !
शिव वंदना हम करें!!
शिव सर्वस्व है।
शिव संरक्ष्य है।
शिव हित में हमारा भी
भवितव्य है।।
मुक्त मन से शिव भजो !
शिव की वंदना हम करें!!
शुद्ध चित प्राण मन से!
शिव-वंदना हम करें!!
शिव ही सत्व है।
शिव ही तत्व है।
शिव गतिमान है!
शिव चिरंतन है!!
मुक्त चित प्राण मन से!
शिव की वंदना हम करें!!
शुद्ध चित प्राण मन से!
शिव वंदना हम करें!!
(नेपथ्य में गीत शनै: शनै: स्थिर हो जाती है।)
वीरभद्र :- दूत हमें विस्तार से बताओ महाकालपुरम् में क्या हुआ! . . .मन्दिर की इस स्थिति के लिए कौन ज़िम्मेदार है !
(दूत ज़मीन की और कुछ क्षण देखता ,उसके आँखों में आँसू है ।)
दूत तुम कुछ बोलते क्यूँ नहीं !
दूत :- आर्य अब सुनाने के लिए बचा ही क्या है !
(दूत पुनः शीश झुका लेता है ।)
(ग्राम गवयपुरम् के महा-पुरोहित श्रीमंत शास्त्री का मंच पर प्रवेश )
श्रीमंत शास्त्री :- आर्य वीरभद्र !. . .कपालिकों एवं तांत्रिकों ने महाकालपुरम् को तहस-नहस कर दिया है । मन्दिर के गर्भ-गृह में कई दिनों से पूजा-अर्चना नहीं की गयी है।
वीरभद्र :- कदाचित् यह इस राष्ट्र के लिए अपयश है। कापालिकों एवं तांत्रिकों को को खदेड़ कर महाकाल को यथास्थित स्थापित कर शिव-सत्ता वापस लाना है ।
दूत :- यह कार्य केवल आप ही कर सकते हैं इसलिए महा-पुरोहित श्रीयुत वाजश्रवा ने मुझे आपके पास भेजा है ।
(ग्राम-प्रमुख आर्य रामकृतदेव का मंच पर प्रवेश । तेजोदीप्त मुखमंडल, प्रशस्त मुख-मंडल एवं ग्राम के सबसे सम्मानित व्यक्ति। आर्य वीरभद्र इन्हें पिता कहकर संबोधित करते हैं ।)
रामकृतदेव :- आर्य वीरभद्र यह बहुत ही निर्णायक घड़ी है! शिव सिर्फ हमारे आराध्य ही नहीं हैं वरन हमारी धर्म और संस्कृति के पालक हैं । कापालिकों और तांत्रिकों ने मंदिर के स्वरूप को विखंडित किया है ।
वीरभद्र :- पिताश्री कदाचित् कापालिकों एवं तांत्रिकों ने हमें कम करके आँका है !
श्रीमंत शास्त्री :- नहीं आर्य वीरभद्र यह एक सोंचा-समझा हुआ आक्रमण है ।वर्तमान धर्म-रक्षक राज-पुत्र सिद्धार्थ की भी इसमें मौन सहमति हैं ।
वीरभद्र :- इससे क्या फर्क पड़ता है कि शत्रु एक है या अनेक ?
रामकृतदेव :- हमें अभेद्य रणनीति बनाकर कापालिकों एवं तांत्रिकों को युद्ध-भूमि में परास्त करना है एवं कुशल संवाद से धर्म-संसद में आजीवक एवं निगंठ पुत्रों को चुनौती-विहीन करना है ।
श्रीमंत शास्त्री :- शत्रु तुम्हें दो तरीके से परास्त करने की कोशिश करेगा । या तो तुम्हें धर्म-संसद में आमंत्रित करके येन-केन –प्रकारेण परास्त करने की कोशिश करेगा ताकि तुम ग्लानि-वश मृत्यु को प्राप्त हो जाओ या छल से युद्धभूमि में तुम्हें ख़त्म करने की कोशिश करेगा ।
वीरभद्र :- आचार्य-श्रेष्ठ मैं दोनों स्थिति के लिए तैयार हूँ ।
(मंच पर दृश्य बदलता है । मंच पर देविका एवं सूत्रधार का प्रवेश )
सूत्रधार :- आह देविका तुम जानती हो धर्म-संसद में क्या हुआ ।
देविका :- नहीं आर्य ,मैं अनभिज्ञ हूँ ।
सूत्रधार :- धर्म-संसद बैठा था ,परन्तु आर्य वीरभद्र के बुद्धिमता के सामने सब परास्त हो गए ।स्वयं शाक्य पुत्र सिद्धार्थ भी निर्णय कर पाने में सक्षम नहीं थे कि पलड़ा किसका भारी है । अंत में स्वयं शाक्य-पुत्र ने आर्य वीरभद्र से शास्त्रार्थ किया परन्तु वो भी आर्य को परास्त नहीं कर पाए ।
देविका :- आर्य यह तो पाटलीपुत्र एवं आर्यावर्त के लिए शुभ संकेत है । अब तो निःसंदेह शिव-सत्ता फिर स्थापित हो जायेगी ।
सूत्रधार :- देविका तुम बहुत भोली हो ।यह तो कापालिकों एवं तांत्रिकों को पहले ही पता था कि वे मिलकर भी आर्य वीरभद्र को शास्त्रार्थ में पराजित नहीं कर पायेंगे ।
देविका :- आर्य फिर अब क्या होगा ?
सूत्रधार :- अब निर्णायक युद्ध होगा शिव-सत्ता को स्थापित करने के लिए !

(दृश्य बदलता है )

(ग्राम गवयपुरम् के महा पुरोहित श्रीमंत शास्त्री और ग्राम-प्रमुख रामकृतदेव का मंच पर प्रवेश ,आर्य वीरभद्र वहां पहले से ही मौजूद हैं ।आर्य वीरभद्र समवेत प्रणाम करते हैं आर्य वीरभद्र थोड़े चिंतित हैं ।)
श्रीमंत शास्त्री :- आर्य अब कोई उपाय शेष नहीं बचा है ! तुम्हें शिव-सत्ता की स्थापना हेतु निर्णायक युद्ध लड़ना है।
वीरभद्र :- बात युद्ध की नहीं है, आचार्य ! हमारी सारी रणनीति कापालिकों और तांत्रिकों के पास पहले ही पहुँच जाती है ।
श्रीमंत शास्त्री :- ओह ,कदाचित किसके द्वारा यह किया जा रहा है ।
वीरभद्र :- आचार्य उसी बीजगुप्त के द्वारा जिसने गांधार के एक वणिक-पुत्री से कुछ दिन पहले शादी रची थी ।
उसे प्रलोभन दिया गया है कि महाकालपुरम के जगह पर एक मठ बनाकर उसकी सत्ता उसे सौंपी जायेगी ।
रामकृतदेव :- महाकाल से छल कर उसे कभी सुख और शांति नहीं मिलेगी ।
वीरभद्र – पिताश्री बात सुख और शांति की अभी नहीं है अपितु ऐसी रणनीति बनाने की है कि युद्ध की व्यूह-रचना के बारे में हम तीनों के अलावा किसी को पता नहीं चले ।
आचार्य श्रीमंत:- आर्य वीरभद्र ऐसा ही होगा ! आर्य रामकृतदेव और आर्य आप मिलकर व्यूह-रचना करें और आप स्वयं सेनापति की जिम्मेदारी संभाले ।
वीरभद्र :- ऐसा ही होगा आचार्य ।
(दृश्य बदलता है :-मंच पर सूत्रधार और देविका का प्रवेश )
सूत्रधार :- देवी अस्तु पता होगा कि युद्धभूमि में एक कोटि कापालिक और तांत्रिकों को आर्य वीरभद्र ने स्वयं अपने खड्ग से संहार किया !
देविका :- आर्य यह तो चिर-उल्लास का विषय है ।
सूत्रधार :- हाँ देवी यह उल्लास का विषय है परन्तु आर्य वीरभद्र इस धर्मयुद्ध में स्वयं खेत आये !
देविका :- हे महाकाल मैं कितनी अभागी हूँ ।मैं यह सुनने के लिए क्यूँ जीवित हूँ ।
सूत्रधार :- हाँ देविका ,युद्ध में ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो महाकाल स्वयं वीरभद्र में समाहित हो गए हों । चपला से भी चपल उनकी खड्ग प्रतीत हो रही थी । चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था । तांत्रिकों में तो सबसे पहले उफनती स्वर्ण-गंडकी में कूद कर जल-समाधि ले ली ।
देविका – आर्य फिर क्या हुआ …..??
सूत्रधार :- कापालिकों ने जमकर लोहा लिया परन्तु आर्य वीरभद्र ने शिव-तांडव करते हुए युद्धभूमि में संहार करना शुरू किया । इसी बीच किसी ने धोखे से आर्य वीरभद्र के पीठ पर विष-खड्ग से प्रहार किया । प्रहार के पश्चात् भी आर्य वीरभद्र अंत समय तक युद्ध करते रहे।
देविका :- आर्य ,अभी पार्थिव शरीर आर्य वीरभद्र का कहाँ है ..?
सूत्रधार – महाकालपुरम के परिसर के पीछे उन्हें अग्नि को समर्पित किया जाएगा ।
देविका – आर्य चलो चले उस शिव-पुत्र को अंतिम प्रणाम देने ।
सूत्रधार – हाँ देवी ,चलो चले महाकालपुरम ।

(नेपथ्य से ध्वनि सुनाई दे रही है …………)
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।
(पटाक्षेप)

लेखक- उदय कुमार

लेखक –परिचय
जन्म- 22 नवम्बर 1974
शिक्षा-
स्नातक – गणित तथा विधि में –दिल्ली विश्वविद्यालय ।
स्नातकोत्तर – मानवाधिकार , पुलिस प्रशासन एवं न्याय ।
प्रबंधन – मानव संसाधन , आपदा प्रबंधन

संप्रति- अधिकारी , केन्द्रीय सुरक्षा बल , नई दिल्ली
प्रकाशित कृतियाँ-
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं प्रकाशन तथा आकाशवाणी से प्रसारण । आतंरिक सुरक्षा प्रबंधन पर पुस्तकों का प्रकाशन ।

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