मिट्टी बेचकर भी रोजगार होता है

जी हां, आपने सही पढ़ा, मिट्टी बेचकर भी रोजगार होता है। मुलतानी मिट्टी के बारे में सब लोग जानते ही होंगे कि चेहरे की सुन्दरता को निखारने; मुंहासे और चेहरे की टैनिंग हटाने; क्लींजर के रूप में; शरीर की त्वचा को स्वच्छ रखने एवं बालों की साफ-सफाई के लिए शैम्पू के रूप में मुल्तानी मिट्टी बहुत उपयोगी है।

दही या दूध, चंदन चूर्ण और गुलाब जल के साथ मिलाकर चेहरे पर इसका लेप करने से तेज धूप और ग्रीष्म ऋतु में भी त्वचा की नमी को कायम रखने में यह सहायक है। इस मिट्टी की तासीर ठंढी होती है। पेट पर मिट्टी के लेप करने के तो अलग ही लाभ हैं।

तीस वर्ष पहले बाजार में मुल्तानी मिट्टी की एक टिकिया 2 रूपये में मिलती थी, आज शायद 10-15 रूपये में मिलती हो। बिहार में जहाँ मैं नौकरी करता था, उस इलाके में और हमारे क्वार्टर के सामने भी जो चिकनी केवाल मिट्टी प्राकृतिक रूप से उपलबद्ध थी; वह मुल्तानी मिट्टी जैसे ही गुणों से युक्त थी; जिसका उपयोग हमलोग यदा-कदा कर लिया करते थे। बिहार और झारखंड में अनेक जगहों पर काली चीकट मिट्टी भी मिल जाती है। मिट्टी_के बर्तन बनाने में भी इसका बहुत उपयोग है।भारत में अनगिनत स्थानों पर ऐसे गुणों वाली मिट्टी प्राकृतिक रूप में  मुफ्त उपलब्ध है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि प्राकृतिक रूप से मुफ्त उपलब्ध ऐसी मिट्टी का सदुपयोग करने पर देश की GDP नहीं बढ़ती है। इसलिये जाने-अनजाने और लुभावने विज्ञापनों से प्रभावित होकर तथा बाजारवाद की चपेट में आकर हम नाना प्रकार के फेसपैक, फेसवाश और शैम्पू जैसे: लक्मे, हेयर एन्ड शोल्डर्स, सनसिल्क आदि खरीदकर देश की GDP बढ़ाने में योगदान करते हैं। हमें शायद यह भान नहीं है कि ब्रांडेड चीजें क्रय करके हम स्वयं ही अपनी जेब के दुश्मन, अपने धन के शत्रु बने हुए हैं। कोई बात नहीं; धन का अपव्यय करते रहिये और देश की GDP बढ़ाने में अपना योगदान करते रहिये!

राज किशोर सिन्हा के फेसबुक वॉल से सभार

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार, अनुवादक और प्रूफ रीडर हैं।

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