पैक्स की संपत्ति सहकारी बैंक को सौंपने की संभावना ! PACS Property to Cooprative Bank !

पैक्स की संपत्ति सहकारी बैंक को सौंपने की संभावना कल्याणकारी भावना के विपरीत

अल्पकालिक ऋण सहकारी संरचना पर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में कई एतराज वाली बातें हैं जिसको दूर करके समाज के सबसे निचले दहलीज पर मौजूद किसान के हित की रक्षा होनी चाहिए.

अल्पकालिक ऋण सहकारी संरचना (ATCCS) पर विशेषज्ञ समिति की एक रिपोर्ट और उसका पैक्स पर असर को लेकर नेशनल कॉपरेटीव यूनियन ऑफ इंडिया ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए देश में इसका विरोध करने का मन बना लिया है और देशब्यापी आंदोलन करने का भी संकेत दिया है.

ग्रामीण ऋण सहकारिता का जन्म अब से तकरीबन 110 पहले यानी 1904 में हुआ था। समय के साथ इसका विस्तार मुख्यत: दो क्षेत्रों में हुआ। पहला, किसानों को फसल के लिए जरूरी ऋण मुहैया कराना । दूसरा, कृषि की जरूरतों के लिए किसानों को लंबे अवधि के ऋण उपलब्ध कराना।

पैक्स पहला काम करती है यानी किसानों को बेहतर फसल उपजाने में तुरंत जरूरी ऋण मुहैया कराने से लेकर बीज और खाद वितरित करने जैसा पवित्र काम करती है। पैक्स के सदस्य और कोई नहीं बल्कि वो किसान है जो मेहनत कर अन्न पैदा कर रहा है। खून पसीने से जमीन जोत रहा है, कृषि उत्पादन में लगा हुआ है। अब संशय पैदा हो गया है कि किसानों की सदस्यता वाले इसी पैक्स को ही खत्म करने की कोशिश हो रही है।

पैक्स की संपत्ति जिला स्तरीय सहकारी बैंक को सौंपने की बात हो रही है। एन. सी. यू. आई. के अध्यक्ष डॉ. चंद्रपाल सिंह यादव का कहना है कि “ पैक्स के सदस्यों को कमीशन पर काम करने वाले एजेंट बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह आने वाले समय में गरीब किसानों के मदद की भावना को लेकर बने पैक्स को खत्म कर देगा। बेहतर तो यह होता कि पैक्स को मजबूती दिलाने के लिए किसानों के हाथ से राष्ट्र निर्माण के लिए अन्य जरूरी काम करवाए जाते। योजनाओं के क्रियान्वयन में लगाया जाता और बिल्कुल निचले पायदान पर मौजूद पैक्स जैसे संस्था के सदस्यों में गौरव का भाव भरा जाता। लेकिन उल्टा हो रहा है ”.

इस मामले में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने बीते 22 जुलाई को सर्कुलर भेजा है। नाबार्ड के इस सर्कुलर के बारे में एन. सी. यू. आई. के अध्यक्ष डॉ. चंद्रपाल सिंह यादव का कहना है कि यह न सर्कुलर सिर्फ सरकार की कल्याणकारी भावना के मकसद के विपरीत है बल्कि इससे संविधान की वो मूलभूत भावना भी धूमिल हो रही है जिसके लिए 97 वां संविधान संशोधन पारित किया गया है। इससे सहकारिता को हमारा मौलिक अधिकार बना दिया गया है।

वहीं NAFASCOB की का मानना है कि NABARD का यह सर्कुलर राज्य सरकारों के अधिकार का अतिक्रमण है। संघीय ढ़ांचा के खिलाफ है। सहकारिता पूरी तरह से राज्य का विषय है और इसमें केंद्रीय व्यवस्था का कोई हस्तक्षेप हो ही नहीं सकता। फिर सर्कुलर जारी करने का आधार बने सुझाव पर ही विवाद है। सुझाव देने वाले अध्ययन रिपोर्ट की कमेटी के ज्यादातर सदस्यों ने सुझाव पर असहमति जताई है। इससे पैक्स को खत्म करने की कोशिश के विरोध को ताकत मिला है। और यह भी पता लगा है कि यह सर्कुलर गैर वाजिब है।

एस.टी.सी.सी.एस. पर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में कई एतराज वाली बातें हैं जिसको दूर करके समाज के सबसे निचले दहलीज पर मौजूद किसान के हित की रक्षा होनी चाहिए।

*Full form of NAFASCOBNational Federation of State Cooperative Banks Limited 

*Full form of NABARDNational Bank For Agriculture And Rural Development

*Full form of PACS –Primary Agricultural Credit Society

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