हिंदी दिवस: कब मनाया जाता है, जानिए क्या है इसका इतिहास। Hindi Diwas 2020

वर्ष 1953 से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।

देश में पहली बार 14 सितंबर, 1953 को हिंदी दिवस मनाया गया था। हिंदी दिवस मनाने की शुरुआत राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर हुई थी। और हर साल हिंदी दिवस मनाया जाने लगा। हिंदी दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिंदी को न केवल देश के हर क्षेत्र में ले जाना और लोगों को जागरुक करना है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी प्रसारित करना है। आइए जानते हैं कि 14 सितंबर को ही हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है और क्या है इसका इतिहास।

हिन्दी दिवस का इतिहास । History of HINDI Diwas

वैसे तो हिन्दी दिवस का इतिहास और इसे दिवस के रूप में मनाने का कारण बहुत पुराना है। वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने इसे जनमानस की भाषा कहा था और इसे देश की राष्ट्रभाषा भी बनाने को कहा था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त,रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास और व्यौहार राजेन्द्र सिंह आदि लोगों ने बहुत से प्रयास किए।

साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अथक प्रयास किया, और उनके प्रयासों की वजह से हिंदी राष्ट्रभाषा बन सकी।  सविंधान सभा ने उनके विचारों को संज्ञान में लेते हुए 14 सितंबर, 1949 को सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा होगी।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना 1936 में हुई थी और इसका मुख्य केंद्र महाराष्ट्र के वर्धा में था। इस समिति के प्रमुख डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, सुभाषचन्द्र बोस, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, आचार्य नरेन्द्र देव जैसे लोग थे।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने वर्ष 1953 में सरकार से 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का अनुरोध किया। इस अनुरोध को स्वीकार करने के बाद से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाने लगा।

हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में कार्यक्रम

हिन्दी दिवस के दौरान देश भर में कई कार्यक्रम का आयोजन होता है. नागरिकों को हिन्दी के प्रति सम्मान और दैनिक व्यवहार में हिन्दी के उपयोग करने के लिए जागरुक किया जाता है। हिन्दी के प्रति लोगों को प्रेरित करने के लिए हिन्दी दिवस पर भाषा सम्मान देने की शुरुआत भी की गई है। यह सम्मान प्रतिवर्ष ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जिसने हिन्दी भाषा के प्रयोग और उत्थान के लिए विशेष योगदान दिया हो।

जानिए भारत की राजभाषा नीतिः

राजभाषा नीतिः  26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ साथ राजभाषा नीति भी लागू हुई। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि भारत की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप है। हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का प्रयोग भी सरकारी कामकाज में किया जा सकता है। अनुच्छेद 343 (2) के अंतर्गत यह भी व्यवस्था की गई है कि संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक, अर्थात वर्ष 1965 तक संघ के सभी सरकारी कार्यों के लिए पहले की भांति अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग होता रहेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी कि इस बीच हिन्दी न जानने वाले हिन्दी सीख जायेंगे और हिन्दी भाषा को प्रशासनिक कार्यों के लिए सभी प्रकार से सक्षम बनाया जा सकेगा।

अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भारत की राजभाषाः  अनुच्छेद 344 में यह कहा गया कि संविधान प्रारंभ होने के 5 वर्षों के बाद और फिर उसके 10 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे, जो अन्य बातों के साथ साथ संघ के सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में और संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग पर रोक लगाए जाने के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा। आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए इस अनुच्छेद के खंड 4 के अनुसार 30 संसद सदस्यों की एक समिति के गठन की भी व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 120 में कहा गया है कि संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। वर्ष 1965 तक 15 वर्ष हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी अंग्रेजी को हटाया नहीं गया और अनुच्छेद 334 (3) में संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह 1965 के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रखने के बारे में व्यवस्था कर सकती है। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भारत की राजभाषा है।

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