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मध्याह्न भोजन योजना को प्रबंध करने का बोझ शिक्षकों पर नहीं डाला जाए, यह “गैर-शैक्षणिक कार्य” : उच्च न्यायालय

एक महत्वपूर्ण आदेश में बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि मध्याह्न भोजन योजना को प्रबंध करने का बोझ शिक्षकों पर नहीं डाला जाए, यह  एक “गैर-शैक्षणिक कार्य” है.

शिक्षकों पर यह जिम्मेदारी डालना शिक्षा अधिनियम की धारा 27 का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी कहा कि धारा 27 के अनुसार कोई भी शिक्षक  जनसंख्या जनगणना, आपदा राहत कार्य या स्थानीय प्राधिकरण, राज्य विधायिका या संसद चुनाव  से संबंधित कार्यों के अलावा अन्य किसी भी गैर-शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैनात नहीं किया जाए। 

एक संगठन द्वारा दायर याचिका पर अदालत ने 22 जुलाई, 2013 को  जारी राज्य सरकार के दिशा निर्देशों को संदर्भित करते हुए कहा कि शहरी क्षेत्रों में महीने में एक बार हेडमास्टर या वरिष्ठ शिक्षक केंद्रीय रसोई का निरीक्षण कर स्वच्छता सुनिश्चित करेगें।

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने हेतु,  केंद्रीय रसोई की निरीक्षण के लिए एक महीने के भीतर शहरी क्षेत्रों में विशेषज्ञ मंडल की एक स्वतंत्र एजेंसियों बनाने के लिए निर्देश दिया। राज्य सरकार को एक अप्रैल तक अनुपालन रिपोर्ट फाइल करने के लिए भी कहा गया है।

मध्याह्न भोजन योजना की शुरुआत 1995 में केन्द्र सरकार ने स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए किया था।  महाराष्ट्र सरकार ने जून 2009  में शहरी क्षेत्रों के स्कूली बच्चों के लिए केंद्रीय रसोई  द्वारा पकाया हुआ भोजन आपूर्ति का काम शुरू किया था। संगठन द्वारा याचिका में कहा गया है कि जून 2009 से पहले भोजन की आपूर्ति के लिए स्थानीय महिलाओं के समूहों को अनुबंध दिया गया था।

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