अर्धांगिनी का संबल मिले तो कालिदास भी विद्वान हो जाता है वरना वशिष्ठ भी विक्षिप्त हो जाते हैं....

बचपन में सुना करता था कि कोई वशिष्ठ नारायण सिंह है, बड़का गणितज्ञ था “पगला” गया। आर्यभट्ट की भूमि का दंभ भरने वाला बिहार तब अज्ञानता के अंधेरे में इतना डूबा था की जिस इंसान को माथे का मुकुट बना कर सजाना था उसे मज़ाक का मुहावरा बना दिया।...

उस ज़माने में चंद पन्नों वाली समाचार पत्र के किसी कोने में उनके गुम हो जाने की खबर छपी हो, लेकिन तब वायरल यूग तो था नही, सो ख़बर भी वायरल नही हुई, तो सोई हुई जनता जानती और जागती कैसे...और तब की सरकार शायद निक्कमों की सरकार रही होगी जो उन्हे ढूंढ भी ना सकी... या यूं कहें कि मरे हुए ज़मीर लिए सरकार भी सोई होगी....लगता तो ये भी है कि परिवार वालों ने भी अपने स्तर पर खोज ख़बर लेने की जरुरत नही समझी....कौन लेता है भला ऐसे व्यक्ति की खोज ख़बर जो ना कपटी हो, ना स्वार्थि हो, ना हीं मतलबी हो...और ना हीं उससे किसी को अपना फायदा दिखता हो...वही हुआ जो ऐसे लोगों के साथ होता है...भटकते रहे,... आइंस्टीन के सापेक्षता की सिद्धांत को चैलेंज करने वाला सदी का महान गणितज्ञ चीथड़े में लिपटा हुआ गुमनामी के चेहरे पर बेतरतीव दाढ़ी लिए शहर दर शहर भटकता रहा... कूड़े-कचरों से जूठन खा कर जिंदा रहा....... फिर अचानक एक दिन किसी को ...कूड़े के ढ़ेर पर दिख गए...लेकिन अब जर्जर काया के अलावा कुछ शेष नही बचा था उस इंसान में....

बीतते समय के साथ जिसे अपने भूल चुके थे, तो मुझे क्या पड़ी थी कि मैं उसे याद रखता, सो मैं भी भूल गया....पढाई के लिए दिल्ली आया और जीवन यापन के लिए पत्रकारिता के पेशे में आ गया... एक दिन मैने सोचा कि क्यों न बिहार के विभूतियों पर स्टोरी बनाई जाए......सोचने लगा कौन कौन हो सकते हैं...तो अचानक से ज़ेहन के किसी कोनो उस “पगले” का नाम आया...तो लगा उन्हें खोजने.. गूगल किया, गांव का पता किया...पत्रकारों से बात की तो पता चला कि उनका दिल्ली के शहादरा स्थित मानसिक अस्पताल में ईलाज हो रहा है....अस्पताल पहुंचा, तो पता चला कुछ महीनों से उनका ईलाज यहां चल रहा है...संयोग से डॉक्टर साहब बिहार के हीं थे और समर्पित भाव से इस महान व्यक्ति की इलाज कर रहे थे और जो भी संसाधन उपलब्ध हो सकता था उसके इंतजाम में उन्होनें कोई कमी नही की थी....मैने कहा डॉक्टर साहब इन पर एक स्टोरी करना चाह रहा हूं आपकी अनुमति चाहिए...उनके अनुमोदन के बाद डॉं. वशिष्ठ नारायण सिंह के मनःस्थिति के बारे में उनसे जानकारी ली...उनकी परिस्थिति और मनःस्थिति को समझने में मनोविज्ञान और सोशल वर्क के छात्र होने का लाभ मिला...

वशिष्ट बाबू को डॉक्टर साहब से बहुत लगाव था...होता भी क्यों न, कोई कमी ना की थी डॉक्टर साहब ने.... उन्होंने मुझे पहले माता जी से मिलवाया...माता जी ने भोजपूरी में बात शुरु की तो मैं भी भोजपुरी में हीं अपना परिचय देते हुए उनको प्रणाम किया....विडंबना देखिए एक बुढ़ी मां अपने सिजोफ्रेनिक अधेर बेटे का ईलाज खुद करा रहीं थी, परिवार के अन्य लोगों का साथ ना होना दुखद था....अब डॉक्टर साहब ने मेरा परिचय वशिष्ठ बाबू से कराया...उनका चरणस्पर्श करते हुए मैने उनसे पुछा “का हाल बा..” उन्होंने कुछ बोलने की कोशिश की लेकिन बोल नहीं पाए... केवल सिर हिलाया, थोड़ा खिसक कर अपनी मां और उनके बीच जगह बनाई फिर तकिए की ओट ले किताब पढने लगे..... मैं उन दोनो के बीच बैठ गया... वशिष्ठ बाबु से बात करने बजाय मैने माता जी से बात करना शुरु किया....उन्होंने कहा की ई केकरो से बात ना करें लें बात ना करिहैं....हमने कहा कौउनो बात ना...इनका परेशान ना करेम, फिर उनसे हीं बचपन से लेकर अब तक की बात सिलसिलेवार ढ़ंग से होती रही.. वो बताती रहीं और बीच–बीच में मैं वशिष्ठ बाबू की ओर देखकर मुस्कुरा देता वो भी थोड़ा देखते फिर कॉपी पर कुछ लिखने लगते.. चाय आई, उनको देते हुए पूछा पानी पीअम का, उन्होने हां में कहा फिर मैने गिलास में उनको पानी देते हुए उनकी चाय की कप अपने हाथ में ले ली...उनको शायद ये बात अच्छी लगी...खैर वो चाय पीते रहे और किताबों को पलटने लगे... चाय के साथ माता जी से फिर बातचित शुरु हुआ उनकी मां नही चाहती थी की बेटा दोसर देश जाए...

कहा जाता है कि जिस कैली साहब के अंदर में रिसर्च कर रहे थे उन्होनें अपनी पुत्री का हाथ इनको सौंपना चाहा, लेकिन जिसे अपनी मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से प्यार हो वो भला क्यों विदेशी मूल में अपनी आत्मा को समर्पित करता...लौट आए वतन. एक अधिकारी की पुत्री से विवाह हुआ, आधुनिक ख्याल और शानो-शौकत में पली लड़की का मन कहां एक पढ़ाकु, रिसर्चर, थिंकर और भावनात्मक व्यक्ति के साथ लगता... बातों के दौरान पता चला कि वैवाहिक जीवन की कड़वाहट उनके भावनात्मक व्यक्तित्व पर गहरा आघात किया। यहां यह समझना मुश्किल नहीं की जिसे अपनी मिट्टी से प्यार हो उसे भला अपनी मां और परिवार से क्या कम लगाव रहा होगा, वह कितना भावुक मन का होगा ।

छल-कपट विहीन ह्रदय शाब्दिक चोटों और तानों को सह न सका और मन- मस्तिष्क के तंतु का ताना-बाना बिखर गया... समाज का स्नेह और पत्नी से मिलने वाले संबल की कमी ने इस जीनियस को कमजोर कर दिया........जिसे जीवन संगिनी बनाया वो शादी एक वर्ष के अंदर हीं उन्हें छोड़कर चली गई.  कहीं न कहीं यह टीस उनके मन में रही होगी कि जिस देश, समाज, परिवार के खातिर अमेरिका-नासा-कैलिफोर्निया को छोड़ दिया उसे वहीं  सम्मान, स्नेह और संबल नहीं मिल रहा..... आखिर वो भी तो हाड़ मांस का इंसान हीं था....एक महान गणितज्ञ पर ऐसा भावनात्मक प्रहार हुआ की जीनियस बिखर गया...और सिजोफ्रेनिक हो गया...

इंसान तो एक सामाजिक प्राणी..उसे भी प्रतिष्ठा, इज्जत और संबल की दरकार होती है.... मैस्लो की आवश्यकता के सिंद्धातं के अनुसार इंसान की जरुरतों की आखिरी फेज होता है सेल्फ ऐक्चुअलाईजेशन का ...लेकिन उसके पहले उसकी. शारीरिक एवं सुरक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के साथ सामाजिक आवश्यकताएँ भी उत्पन्न होती हैं । इसमें मनुष्य का अपनत्व, प्रेम व स्नेह की आवश्यकता शामिल होती है । मनुष्य चाहता है कि उसके मित्र व सम्बन्धी हों जिसके साथ वह अपना दु:ख दर्द बाँट सके, मिलकर खुशी मना सके तथा अपना समय व्यतीत कर सके । शायद इसका अभाव था वशिष्ठ बाबु के जीवन में।

खैर जो भाग्य में वदा था वही हुआ, गणित के क्षेत्र में नई सिंद्धांतों को प्रतिपादन करने की माद्दा रखने वाले सितारे को अंधेरों ने ऐसा जकड़ा की फिर कभी वह अपने ज्ञानकुंज से जहां को रौशन न कर सका....

       

माताजी के मन में यह टीस थी की शुरुआती दौर में हीं सही उपाचार मिलता तो शायद उनके ठीक होने की संभावना बढ़ जाती... बिहार सरकार द्वारा उनके उपचार पर हो रहे खर्च को रोक देना और रांची के अस्पताल से जबरन निकाल देना घातक और मर्माहत करने वाला वाक्या है। माता जी के अनुसार, लोग कहत रहे कि मुख्यमंत्री के रिस्तेदार के असपताल में जगह दिलावे खातिर इनका के निकाल दिहल गईल... लोगों ने जो भी कहा हो लेकिन ये तो सिद्ध है कि तत्कालीन सरकार ने इनकी सुध लेने के बजाय इनको अपने हालात पर छोड़ दिया। उस अस्पताल पर कोई कार्रवाई नहीं की गई जिसने इनके ईलाज को रोक दिया, उस अधिकारी की जवाबदेही तय नही हुई जिसने इनके ईलाज में होने वाले राशी को रोक दिया। सरकार, या यूं कह लें कि मुख्यमंत्री स्वयं जाग रहे होते तो ये सितारा आज गणित के गगन पर जगमगा रहा होता।

अगर ढंग से ईलाज होता, तो हो सकता था कि जीने के लायक जिंदगी हो जाती. लेकिन जो सिस्टम खुद बीमार हो वो भला ऐसे लोगों की क्या सुध लेता, जिसके प्रति समाज और परिवार उदासिन रहा हो।

वर्षों बाद उनका अपने ससुराल के पास के शहर में मिलना कोई सधारण बात नही थी।  यह इस बात की तस्दिक करता है कि वो गुम होते यादाश्त को समेटे स्नेह की आस लिए भटकते रहे, जूठन खा कर जिंदा रहे, कभी कोई पगला कहता होगा तो कभी पत्थर मार भगा देता होगा। कितनी यातना सही होगी इसका अंदाजा लगना मुश्किल नही है.

मैने कैली की किताब अपने हाथ में लिया और उनको वह चैप्टर दिखाया जिसमें उनका रिसर्च पेपर छपा था..और फिर हसते हुए उनसे कहा राउरे लिखल बा... वो किताब खोलकर कॉपी पर कुछ लिखने लगे..मुझे भी देखते...मैने पूछा केलि साहेब याद बारें... शब्दों को जोड़कर सार्थक वाक्य बनाने की उनकी नाकाम कोशिश जितना उन्हें कचोटती होगी उससे कहीं ज्यादा पीड़ा मैं महसूस कर रहा था...कई बार भावुक हुआ, स्वंय को नियंत्रित कर पूछा...गांव चलेम का...हां में जवाव दिया,...माता जी उनसे बोली ई लईका आपन गांव हीं के बारें, तोहरा से मिले खातीर आईल बारें...वो हसंने लगे.. गांव का नाम सुनते एक अलग सा भाव उनके चेहरे पर आ गया.. मैंने कहा ..ई सब दीवार पर का लिखले बानी... गणित-भौतिकी की चंद शब्दों को बोल कर चुप हो गए और फिर कॉपी पर लिखने लगे...मैने पत्नी के बारे में जानने हेतु कहा कि हम गावं जात बानी उनका खातिर कुछ कहे के बा... हंसने लगे....इसी बीच माता जी ने इशारा किया की वोकरा बारे बात मत करअ.... मनोविज्ञान कहता है अप्रिय बातों से आघात बलवती होता है..लेकिन मैं थोड़ा कठोर ह्रदय से उनके भाव को पढ़ने हेतु इस सीमा रेखा को लांघ गया...फिर स्थिति अनुसार उनकी किताबें दिखाता और उसमें लिखी बातें बोलता..वो भी कोशिश करते लेकिन कुछ बोलते फिर रुक जाते..किताब को देखने लगते...मैने कहा ..घूमे खातिर चलेम का...चलीं बाहार घूम के आवत बानी ... बेड से स्वयं उतरे ..बरामदे पर दो तीन चक्कर लगाया फिर वहीं रखे बेंच पर बैठ गए, मुझे भी बैठने का इशारा किया...मैं कुछ बोलता वो कभी बोलते फिर चुप रहते दूर निहारते फिर बोलने की कोशिश करते....शाम होने वाली थी मैने कहा हम जात बानी चलीं रौउआ के कमरा में बैठा दिं.. साथ बैठी माता जी भी उन्हे अंदर आने को कहा....

मैं व्यथित मन, व्यवस्था के प्रति रोष और उस इंसान के प्रति घृणा लिए लौट आया जिसे इनका संबल बनना था उसने भौतिक सुख के खातिर एक गणितज्ञ को ऐसा मानसिक आघात दिया की वो उबर न सका ...तत्क्षण मन में यह भी प्रण किया था की उनके नाम से एक स्कॉलरशिप शुरु करवाऊंगा लेकिन जीवन की आपाधापी में अब तक ऐसा कर न सका. महसुस करता हूं कि मैंने भी उनके साथ छल किया....वशिष्ठ बाबू हो सके तो इस देश को, अपने समाज को और मुझे माफ़ कर देना...

बिहार सरकार से गुजारिश है कि कम से कम इस महान पुरुष के किताबों, कॉपियों, डायरियों और दीवारों पर लिखे शब्दों का संग्रह कराए और साथ हीं इनके नाम से कोई योजना या स्कॉलरशिप शुरु करे ताकि आने वाली पीढी यह जान सके की ...वशिष्ठ जैसा कोई महान गणितज्ञ बिहार की धरती पर पैदा हुए थे....

 

(विकास सिंह)

 

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