भारतीय वेशभूषा और वस्त्र । इनका शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्व

मानव सभ्यता के बदलते काल पर ध्यान दें मानव के स्वास्थ्य का सम्बंध भोजन से तो रहा हीं है साथ ही वस्त्रों से भी कम नहीं रहा। आज की दौर में सामाजिक व्यवस्था में वस्त्र इतने आवश्यक हो गए हैं कि इससे आपके व्यक्तित्व का आंकलन होने लगा है।  यों तो निसर्ग ने मनुष्य को नंगा, वस्त्रहीन पैदा किया है और उस दृष्टिकोण से वस्त्रावरण उसके लिये कृत्रिम तथा अस्वाभाविक आवश्यकता है। अब चूँकि हजारों वर्ष से मनुष्य वस्त्रों को पहनता चला आया है, उसका शरीर सर्वथा, सब ऋतुओं तथा कालों में नंगा रह सकने में अक्षम हो गया है। साथ ही लोक-लज्जा तथा सामाजिक व्यवस्था और मानवीय मान्यताओं के कारण वस्त्र अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। सभ्यता का एक अंग मान लिया गया, शिष्टता तथा शालीनता का चिन्ह बन गया है।  तात्पर्य यह कि वस्त्र आज सभ्यता, शिष्टता तथा मानवता का चिन्ह बनकर अनिवार्य आवश्यकता बन गये हैं।

अँग्रेजी राज्य में पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी शिक्षा विभाग के एक ऊँचे पद पर थे। उनका संबंध अफसरों से तो रहता ही था, सप्ताह में दो-तीन बार बंगाल के गवर्नर से भी मिलना पड़ता था। किन्तु वे उनसे कभी भी कोट, पतलून पहनकर मिलने नहीं जाते थे। उनका पहनावा तनीदार कुरता तथा धोती रहता था। गवर्नर से मिलने के लिए ‘प्रापर ड्रेस’ का कानून बन जाने पर जब कोट, पतलून पहनने की विवशता आ पड़ी तो वे स्वदेश धनी एक दिन गवर्नर के पास गये और त्याग-पत्र दे देने का प्रस्ताव किया। गवर्नर ने कारण पूछा तो उन्होंने साफ कह दिया कि मुझे कर्तव्यवश आपसे मिलने आना ही होगा अब जिसके लिए कोट, पतलून का पहनना आवश्यक हो गया है। मैं अपनी देशी पोशाक का त्याग नहीं कर सकता इसलिये मजबूरी है कि पद से त्याग पत्र दे दूँ। बंगाल का अंग्रेज गवर्नर विद्यासागर के इस स्वाभिमान से बहुत प्रभावित हुआ और उसने उनके लिए ‘प्रापर ड्रेस’ का नियम अपवाद कर दिया।

लोकमान्य तिलक और पण्डित मदनमोहन मालवीय अदालतों, कौंसिलों तथा इंग्लैंड की पार्लियामेंटों तथा कौंसिलों में अपनी देशी पोशाक कुरता-धोती और पगड़ी पहनकर ही जाया करते थे। उन्होंने किसी दबाव अथवा प्रभाव से अपनी देशी वेशभूषा नहीं छोड़ी। जगत बंध बापू तो इसके आदर्श उदाहरण हैं। वे भारत सम्राट जार्ज पंचम से मिलने गये। नियमानुसार उन्हें बादशाह से मिलने के लिये विशेष पोशाक पहनने के लिये कहा गया। उन्होंने स्वाभिमान पूर्वक उसके पालन से इनकार करते हुये स्पष्ट कह दिया कि वे सम्राट् से अपनी इसी भारतीय भूषा कोपीन तथा उत्तरीय पहने ही मिलेंगे यदि उन्हें स्वीकार हो तो धन्यवाद अन्यथा मैं अपने देश बिना मिले ही वापस चला जाऊँगा। सम्राट् जार्ज पंचम बापू की इस देशभक्ति से बड़ा प्रसन्न हुआ और लँगोट धारी महात्मा से शाही पोशाक में बादशाह की हैसियत से मिले और खड़े होकर हाथ मिलाया। ऐसे-ऐसे ज्वलन्त उदाहरण होने पर भी हम भारतीयों को यदि आज स्वाधीनता के युग में भी अपने राष्ट्र वेश विन्यास के प्रति आस्था नहीं है और भूतपूर्व गुलामी के अवशेष विदेशी वेश अपने शरीर पर धारण किये रहते हैं तो कहना होगा कि हम तन से तो स्वतंत्र हो गये किन्तु मन से अभी भी अँग्रेजों के गुलाम बने हैं जो निश्चय ही एक धिक्कारपूर्ण मनःस्थिति है।

यदि प्रकृति, स्वास्थ्य तथा आवश्यकता के अनुसार देखा जाये तो पहनावे के विषय में भारतीय मनीषियों की मान्यता बहुत प्रशंसनीय तथा हितकर है। वे प्रकृति के इस नियम को जानते थे कि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से वायु तथा सूर्य के प्रकाश का हमारी देह से जितना संपर्क रहेगा उतना ही लाभदायक होगा। इसलिये उनका उद्देश्य, लज्जा निवारण के लिये वस्त्र-धारण करना रहता था। प्राचीन काल में वे एक अधोवस्त्र टखनों तक और ऊपर एक उतना बड़ा ही उत्तरीय डाले रहते थे। बस इससे अधिक वे कुछ न पहनते थे और न ओढ़ते थे। जन-साधारण भी अधिक से अधिक अँगरखा, धोती और पगड़ी पहनते थे जो काफी ढीले-ढाले और आराम देह रहते थे। यह वस्त्र न केवल स्वास्थ्यदायक ही होते थे वरन् सस्ता, सुलभ और जल्दी-जल्दी धोये जा सकने के योग्य भी होते थे। जाड़ों में वे अपेक्षाकृत कुछ मोटे ऊनी वस्त्र पहन लेते थे। यही पहनावा भारतीय जलवायु तथा देश की आर्थिक स्थिति के अनुकूल है, और यही सर्व साधारण को पहनना भी चाहिए। अधिक से अधिक अँगरखा के स्थापना पर कुरता, पगड़ी के स्थान पर टोपी बदली जा सकती है। धोती-कुरता और टोपी वास्तविक भारतीय पहनावा है। इन्हें ही पहना जाना उचित है अन्य अवसरों तथा देशकाल के अनुसार और तरह का भी पहनावा अनुचित नहीं किन्तु वह होना देशी ही चाहिए विदेशी अथवा विजातीय नहीं। इसी में ध्येय है, गौरव है और स्वास्थ्य की सुरक्षा।

स्रोतः अखण्ड ज्योति

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