“उत्तम खेती, मध्धम बान…अधम चाकरी, मौत समान”

उमेश चतुर्वेदी
(वरिष्ठ पत्रकार एवं सलाहकार प्रसार भारती)

हमारे गांव में एक दुबे जी थे, बरमेश्वर दुबे. संघर्ष से निकले थे दुबे जी, शौक से खेती और पशुपालन करते थे. उनका घर गांव में ऐसी जगह है, जहां करीब आधे गांव को बाजार, बस स्थानक, रेल स्थानक जाते वक्त वहां से गुजरना ही पड़ता है. जब भी उनके घर के सामने से युवा गुजरते तो वे एक बात जरूर कहते, सुख चाहो तो करो खेती.
वैसे भी एक कहावत है..
“उत्तम खेती, मध्धम बान
अधम चाकरी, मौत समान”

यानी सबसे उत्तम कार्य है किसानी, कारोबार करना उससे नीचे का काम है, और सबसे खराब काम है नौकरी, क्योंकि इसमें दूसरे की गुलामी करनी पड़ती है. दुबे जी यह लगे हाथों यह कहावत भी सुनाते रहते थे. हालांकि बचपन से ही देखता रहा हूं कि जिनके परिवार में कोई न कोई कमासुत या बहरवांसी रहा और जिसके यहां परदेस से मनीआर्डर आता था, उसकी लाइफ स्टाइल थोड़ी अच्छी रहती थी…खेती करने वालों की तुलना में ज्यादा ही अच्छी.

दुबे जी अक्सर ब्रासलेट की चमकदार धोती पहनते थे, उनके बच्चे भी बढ़िया कपड़े पहनते…बाटा का हवाई चप्पल पहनते थे. जिनका कोई बहरवांसू या कमासुत नहीं होता तो उनके घर के लोग सुबह-शाम गोड़ धोकर चटाकी या खंड़ाऊ पहन लेते. कहीं बाहर जाना हुआ तो रबड़ या प्लास्टिक के चप्पल या जूते उनके पास होते या फिर अपने पुश्तैनी चर्मकार भाई के घर से आया मृत जानवर का जूता. पहली बार उसे पहनने से पहले उसमें तिसी या सरसों का तेल भरकर चौबीस-अड़तालीस घंटे के लिए छोड़ दिया जाता था.  इससे जूता मुलायम हो जाता था और उसे पहनने पर वह चमड़े को छीलता या काटता नहीं था..हालांकि इन जूतों की सुरक्षा बड़ी चुनौती होती थी…अक्सर कुत्ते इन्हें रात के अंधेरे में ले भागते थे..

उन दिनों एक बात और दिखती थी, खेती-किसानी होने के बावजूद हर घर की सहन, छप्पर, छत या पिछवाड़े बरसात से लेकर जाड़े तक लतरें लटकी रहती थीं. बोरो यानी बरबट्टी, नेनुआं, चिंचिड़ा, कुदरन, लौकी, कोंहड़ा, तोरई, करैला, खीरा आदि– आदि. घर की सहन में जगह हुई तो भिंडी, बैंगन, मिर्च, टमाटर और पुदीना के पौधे भी होते थे, अगर सहन में कुछ और जगह हुई तो नीबू, करौंना (करौंदा) रणमेवा और अमरूद के पेड़ भी मिल सकते थे.

रणमेवा नाम सुन बहुत लोग चौंक गए होंगे, पपीते को तब रणमेवा कहा जाता था. इन सब्जियों के लिए ना तो किसी खाद की जरूरत होती थी, ना ही पानी की बस थोड़ी देखभाल की जरूरत होती थी. ये सब्जियां जब फलना शुरू होतीं तो घर की कौन कहे अड़ोसी-पड़ोसी और नातेदार-रिश्तेदार का मन उबा देती थीं. तब इन्हें गांवों में बेचने का चलन नहीं था, मिल-बांटकर खाने का था. लेकिन जैसे-जैसे नई आर्थिकी ने पैर फैलाना शुरू किया गांवों में छत, छप्पर या सहन में इन सब्जियों की खेती भी पिछड़ेपन का प्रतीक मानी जाने लगी. खेत में उगा लिया, वही काफी, अन्यथा यह भी लोग कहने लगे कितना खर्च होगा इन सब्जियों के लिए खरीदकर खा लेंगे. इसका असर यह हुआ कि सब्जी बाजार की नई आर्थिकी बनी. इसके भारतीय परिवारों को दो नुकसान हुए, सब्जियों के लिए उनका आर्थिक खर्च बढ़ गया और जैविक तरीके से मिलने वाली सब्जियां भी गायब हो गईं. सब जगह विकास के बीज का बोलबाला हो गया. परिष्कृत-विकसित बीजों को गांव वाले विकास का बीज ही कहते हैं.

कुछ साल पहले एक कृषि अर्थशास्त्री ने अनुमान लगाया था कि घर में बिना खाद-पानी के तैयार होने वाली इन सब्जियों के चलन से बाहर होने ने देश में करीब तीन सौ करोड़ का सब्जी बाजार बना दिया है. मुझे तो लगता है कि वह बाजार अब और बड़ा हो गया है, लेकिन कोरोना के संकट ने एक बार फिर अतीत की ओर लौटने का मौका दिया है. लोग अब खेती की बात करने लगे हैं. छत पर ही सही, तरकारी-भाजी उगाने की बातें करने लगे हैं. कुछ तो उगाने भी लगे हैं और अड़ोसियों-पड़ोसियों को प्रेरित भी कर रहे हैं.

हमने जयशंकर प्रसाद की कामायनी पढ़ी है, उसका पहला पद है…
“हिमगिरि के उतुंग शिखर पर
बैठ शिला की शीतल छांह
एक पुरूष देख रहा था..
भीगे नयनों से प्रलय प्रवाह..”

कोरोना ने वैसा प्रवाह तो हमारे सामने उपस्थित नहीं किया है फिर भी हम इसे आधुनिक प्रलय तो कह ही सकते हैं. कुछ तो कह रहे हैं कि प्रकृति से दूर जाने, उसके मूल स्वरूप से लगातार विचलित होने की मानव जिजीविषा पर प्रकृति ने कोरोना के जरिए ब्रेक लगाने की कोशिश की है. मानव को मूल प्रवृत्ति की ओर मोड़ने की दिशा में भी कोरोना के असर को देखा जा रहा है.
बहुत लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं. बहुत अपने उन गांवों को ही लौट चुके हैं, जिसे उन्होंने पिछड़ा और अवसरहीन मानकर छोड़ दिया था.

आर्थिकी और शहर का जितना गहरा रिश्ता है, अर्थ से वैसी नातेदारी गांव की नहीं है. वहां घर किराए के नहीं होते. कमोबेश पानी भी अब भी मुफ्त में उपलब्ध है. थोड़ी जमीन हो और थोड़ी मेहनत हो अनाज भी पैदा किया जा सकता है…मिल भी सकता है…करीब साढ़े तीन दशक बाद दुबेजी का कथन याद आता है और उसका मर्म भी समझ में आता है. कोरोना ने उसे फिर से समझने का मौका दिया है. दुबे जी की सोच को आनंद बक्षी ने हम पांच फिल्म के एक गाने में सुर दिया है..हम पांच के बोल हैं..
“काश, मेरे पास होती धरती…
धरती पर पैदा होता सोना…
बिकता नहीं दिल का ये खिलौना.”

कोरोना का सबक है. कम से कम अपने पास एक छप्पर होना चाहिए, जिसके नीचे धाराधार गिरते मेह, सरदी और गरमी को झेला जा सके. अपने पास इतना खेत भी होना चाहिए कि पेट भरने के लिए अन्न देवता को उपाजा जा सके. इसके अलावा जीवन की सारी इच्छाएं-अभीप्साएं माया हैं…क्या सोचते हैं आप….

Feartured Image (Courtesy : Krishna Kumar Kanhaiya, Ge Agrimedia Pvt. Ltd.)

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