‘मि. एम. के. गांधी की चम्पारण डायरी’ वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन की यह किताब चम्पारण आंदोलन को दिलचस्प तरीके से रेखांकित करती है…

पुस्तकः  मि. एम. के. गांधी की चम्पारण डायरी
लेखकः अरविन्द मोहन
प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
समीक्षकः प्रियदर्शन (वरिष्ठ पत्रकार)

क्या कोई किसी की डायरी लिख सकता है? अगर डायरी को एक विधा की तरह भी बरता जाए तो भी ऐसे किसी लेखन की कम से कम एक न्यूनतम शर्त ज़रूरी है- डायरी लिखने वाले को उस व्यक्ति के रोज़मर्रा की ही जानकारी न हो जिसकी डायरी लिखी जा रही है, बल्कि उस व्यक्ति के सोचने-विचारने, प्रतिक्रिया जताने के ढंग से भी उसका पूरा परिचय हो। किसी और की डायरी लिखना एक तरह से उस व्यक्ति को उस कालखंड में फिर से जीना है। ज़ाहिर है, काम आसान नहीं है। हिंदी के जाने-माने पत्रकार अरविंद मोहन ने यह मुश्किल काम गांधी के संदर्भ में किया है। उन्होंने महात्मा गांधी के चंपारण आंदोलन के दौरान उनकी डायरी लिख डाली है। कुछ लिहाज से यह काम आसान भी है और मुश्किल भी। आसान इस मायने में कि गांधीजी के जीवन के ब्योरे इतने विस्तार में सुलभ हैं कि उनके एक-एक दिन का ख़ाका बनाया जा सकता है। लेकिन दूसरी तरफ उनको लेकर अध्ययन भी इतना विपुल है कि ऐसे डायरी-लेखन में ज़रा सी भी चूक- चाहे वह तथ्यों की हो या व्याख्या की- पुस्तक पर भारी पड़ सकती है।

बहरहाल, गांधी का बहुत सीमित अध्ययन करने वाले मेरी तरह के पाठक के लिए अरविंद मोहन की यह किताब ‘मि.एम.के. गांधी की चंपारण डायरी’ एक दिलचस्प पाठ साबित हुई। मैं इस बात का मूल्यांकन करने की स्थिति में नहीं हूं कि इस किताब में प्रस्तुत तथ्य कितने प्रामाणिक हैं और लेखक के इस दावे पर भरोसा करके चलना चाहता हूं कि वह सही हैं। लेकिन यह किताब पढ़ते-पढ़ते यह ख़याल भी आया कि भारत में महात्मा गांधी के द्वारा चलाए गए आंदोलनों में बेशक चंपारण को एक प्रमुख हैसियत मिली है, लेकिन गांधी के लिए चंपारण बस एक आंदोलन नहीं था, अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ भारतीय जन-जागरण का एक व्यापक प्रयोग भी था जिसकी परिधि में राजनीति सबसे कम थी, सामाजिक बदलाव सबसे ज़्यादा थे और सबसे ज़्यादा ज़ोर भारतीयता का आत्मविश्वास पैदा करने पर था। महज कुछ ही दिन रहने का इरादा लेकर चंपारण के लिए निकले महात्मा गांधी वहां कई महीने रह गए। उन्होंने कस्तूरबा सहित अपने कई सहयोगियों को वहां बुला लिया। तीन-तीन स्कूल खोले, सेहत और साफ़-सफ़ाई को लेकर लगातार काम किया। यही नहीं, जीवन भर जिन व्यक्तिगत व्यवहारों और सामाजिक कुरीतियों का वह विरोध करते रहे, उनके विरुद्ध लड़ाई यहां भी लड़ी और अपने सबसे क़रीबी सहयोगियों को इसके लिए तैयार किया। कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों के राष्ट्रीय आंदोलन की पूर्व पीठिका गांधी चंपारण के इलाक़े में ही लिख रहे थे। यह डायरी बताती है कि उन्होंने कितनी मेहनत से किसानों की समस्या बस सुनी ही नहीं, उसका दस्तावेजीकरण भी कराया, अंग्रेजी शासन को हालात सुधारने के लिए कमेटी बनाने पर मजबूर भी किया और निलहा अंग्रेजों के छल छद्म और शोषण के ख़िलाफ़ रणनीतिक लड़ाई भी लड़ी।

अरविंद मोहन बताते हैं कि चंपारण आने से पहले गांधी महात्मा या बापू कम, मिस्टर एमके गांधी के नाम से ज्यादा जाने जाते थे। यहीं पर धीरे-धीरे लोगों ने उन्हें बापू या महात्मा कहना शुरू किया। यही नहीं, चंपारण में आम लोगों की गरीबी देखकर उन्होंने अपनी पुरानी काठियावाड़ी पोशाक त्यागी और तय किया कि न्यूनतम कपड़ों में रहेंगे। यानी एक लिहाज से चंपारण ने भी गांधी जी को कुछ बनाया। यह किताब अगर डायरी की तरह न लिखी गई होती तो भी क्या इतनी दिलचस्प होती? कम से कम मेरे लिए इसे पढ़ना बहुत आसान हो गया। हो सकता है, गांधी के उद्भट विद्वानों को किताब में सीमाएं दिखें लेकिन गांधी और चंपारण आंदोलन का प्राथमिक पाठ करने वाले नए पाठकों के लिए यह बहुत उपयोगी किताब है। अरविंद मोहन की सफलता इस बात में भी है कि वह कई जगह बिल्कुल गांधी के लहजे में बोलते दिखाई पड़ते हैं। किताब पढ़ते हुए एकाध बार यह ख़याल नहीं रहता कि आप गांधी की अपनी डायरी नहीं पढ़ रहे, किसी और का लिखा हुआ पढ़ रहे हैं। बेशक, ऐसी जगहें भी हैं जहां अरविंद मोहन का अपना लिखा हुआ पहचान में आ जाता है, लेकिन वह कम हैं और बहुत खटकने वाली नहीं हैं। उलटे, यह बात कुछ विस्मय में डालती है कि ऐसी प्रामाणिक डायरी लिखने के पहले अरविंद मोहन ने कितना अध्ययन किया होगा और कितनी सारी बातों का ख़याल रखा होगा। क्योकि इस डायरी में सिर्फ़ चंपारण नहीं है, देश दुनिया में घट रही कुछ दूसरी चीजों का ज़िक्र भी है। यह ख़याल रखना कि चंपारण में बैठे-बैठे गांधी कहां कहां देख रहे थे, किन-किन बातों पर टिप्पणी कर रहे थे, आसान नहीं है। बेशक, अरविंद जी ने डायरी विधा को एक नया आयाम दे दिया है- ऐसी दूसरी डायरी कम से कम हिंदी में इस लेखक की जानकारी में नहीं है जो किसी और की हो और किसी और ने लिखी हो। 

The NGO Times Remarks: गांधीजी का चम्पारण पहुँचना एक युगांतरकारी घटना थी। गांधी की स्वीकार्यता को बताने के साथ ही अन्याय सहनेवाले जीवंत समाज में प्रतिरोध की शक्ति के उभरने तथा खुद गांधी द्वारा अपनी पूरी ईमानदारी, निष्ठा, दम व समझ के साथ स्थानीय लोगों तथा समस्याओं से एक रिश्ता जोड़ने एवं उन हजारों-लाखों द्वारा गांधी पर भरोसा करके उनको अपनाना भी अद्भुत बात है। गांधीजी कुल मिलाकर साढ़े नौ महीने चम्पारण में रहे, नील के किसानों के शोषण के विरुद्ध शुरू हुए उनका ऐतिहासिक चम्पारण आंदोलन की कहानी कम रोमांचक नहीं है। सच्चे विवरणों के माध्यम से चम्पारण सत्याग्रह की पूरी कहानी छात्रों, शोधार्थियों व शिक्षण कार्य से जुड़े लोगों के साथ-साथ आमजन को के लिए यह किताब पढने योग्य है। महत्वपूर्ण यह है कि जो लोग सामाजिक परिवर्तन के लिए आंदोलन जैसी नीति पर अमल करते हैं उन्हें तो यह पुस्तक अवश्य ही पढ़नी चाहिए।

किताब बुक स्टॉल एवं ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है, आप चाहें तो इसे E-Book के रुप में भी खरीद कर पढ़ सकते हैं।

लेखक परिचयः

लेखक अरविन्द मोहन वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे इंडिया टुडे समूह, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, जनसत्ता सी.एस.डी.एस. और ए.बी.पी. न्यूज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़े रहे हैं। । देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख और कहानी प्रकाशित। इतना ही नहीं, कई बार नियमित पत्रकारिता से ब्रेक लेकर कुछ गंभीर काम किए हैं, जिनमें पंजाब जानेवाले बिहारी मजदूरों की स्थिति का अध्ययन, देश की पारंपरिक जल संचय प्रणालियों पर पुस्तक का संपादन और गांधी के चंपारन सत्याग्रह पर पुस्तक शामिल है। उन्होंने करीब एक दर्जन पुस्तकों का लेखन-संपादन किया है और इतनी ही चर्चित पुस्तकों का अनुवाद। कई पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किए गए हैं। अरविन्द दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया समेत कई संस्थानों में मीडिया अध्यापन भी करते हैं। वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अतिथि लेखक रहे और ए.बी.पी. न्यूज के राजनैतिक विश्लेषक हैं| उन्होंने दिल्ली विश्वविध्यालय व रांची विश्वविध्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त किया है।

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