PRIME MINISTER SPEECH ।प्रधानमंत्री का भावनात्मक भाषण, शांति, सोहार्द और भाईचारे का संदेश : सुल्तान अहमद

प्रधानमंत्री का भाषण सुन के सही मैं मज़ा आ गया, अब तक जितने भी प्रधानमंत्रियों का भाषण सुना था, यह सबसे भावनात्मक, सरल, अपील करने वाला, सीधे दिल को छु लेने वाला आम आदमी के समझ मैं आने वाला था। आज़ादी के बाद मुझे जहाँ तक याद है पहली बार प्रधानमंत्री ने बिना बुलेट प्रूफ के कटघरे मैं खरे होकर पूरा भाषण दिया। लोगों को मूल्यों को सिखाने का पूरा प्रयास, ऐसा लगा मानों मुल्य शिक्षा की पाठशाला चल रही हो , अच्छा है की लोगों, शांति, शौहर्द , भाईचारे की दावत दी ।

दिल्ली से कोसों दूर प्रधानमंत्री को स्वतंत्रा दिवस के शुभ अवसर पर सुनते हुआ ऐसा लगा की वो वही बोल रहें हैं जो देश का हर नागरिक और मैं भी सोचता हूँ । लेकिन मैं ये सोचते हुए आज तक कुछ कर नहीं सका, और मन मैं ख्याल आता रहा की क्या नए प्रधानमंत्री कर पाएंगे ? या यह सिर्फ ये एक अच्छा भाषण भर , जिसे सुनकर काफी सारे लोगों को १९४० के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल याद कर रहे होंगे।

मेड इन इंडिया का नारा लगाने वाले प्रधानमंत्री कितनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में ला पाते हैं और देश को युवाओं को हुनर सिखा कर इन फक्ट्रियों में काम दिलाने में सफल होते हैं।

लाल किले के प्राचीर से स्वंतंत्रा दिवस के शुभ अवसर पर प्रधानमंत्री ने स्वक्षता पर देश वासियों को पूरा ज्ञान दे डाला और अब संसद को मिलेगा फण्ड वो भी अपने कार्य क्षेत्र मैं एक गाँव को मॉडल गाँव बनाने के लिए …ये भी देखते हैं ५४३ मैं से कितने संसद को यह फण्ड मिलता है और मिलने के बाद वो कितने गाँव को मॉडल गाँव बनाते हैं।

प्रधानमंत्री ये क्यों नहीं कहते की कॉरपोरेट घराने और राजनेताओं और प्रशासनिक अफसर को मेहतर बनना चाहिए क्योंकि सबसे ज्यादा गंदगी तो इनके घर के पास ही पाया जाता है या इनके घर से निकलता हैं , चलिए ये भी अच्छा लगा की महात्मा गाँधी को याद करते हुए आज के दिन उनको ये अच्छा लगा बात करना।

प्रधानमंत्री अपने भाषण मैं लाल बहादुर शास्त्री , विवेकानंद , जयप्रकाश नारायण, महर्षि अरविंद आदि का ज़िक्र किया , जिन्होंने भारत को बनाया। बस नेहरू-गांधी परिवार के अब तक के किसी भी सदस्य का कहीं उल्लेख नहीं था। लेकिन श्यामाप्रसाद मुखर्जी , उपाध्याय , सावरकर आदि का भी ज़िक्र नहीं हुआ कि तो लगा की यह पूरा का पूरा चुनावी भाषण भी नहीं था। आश्चर्य यह था की दुनिया की सबसे बड़ी , स्टच्यू ऑफ लिबर्टी से भी बड़ी मूर्ति बनाने वाले सरदार पटेल की मूर्ति बनाने का दावा करने वाले , उन हमवतन गुजरात के लौह पुरुष को भी लालकिले के अपने पहले भाषण में वे भूल गए। कोई बात नहीं सब चलता है।

यह जरूर कहेंगे की यह भाषण दस्तावेजी था और हमें यह सरे वादे याद रखने चाहिए ताकि प्रधानमंत्री जी को अगले साल इन भाषण तैयार करते समय याद दिलाया जा सके।

(लेखक सुल्तान अहमद रिजनल मैनेजर हैं ग्रामवाणी कम्यूनिटी मीडिया के)

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