महज साक्षरता से अशिक्षा के अधंकार का सामना संभव नहीं । Only Literacy is not enough

महाशक्ती बनने का सपना संजोए देश में जहां इस मुद्दे पर गहन चर्चा होनी चाहिए थी कि देश में शिक्षा का स्तर क्या है, वहीं हम इस बात में उलझे हैं कि हमारी साक्षरता दर क्या है और देश में निरक्षर लोगों कि संख्या कितनी है। खैर इस मुद्दे पर यूनेस्को की हालिया वैश्विक शिक्षा निगरानी (जीईएम) रिपोर्ट हमारी आंखे खोलने के लिए काफी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान परिस्थिति के आधार पर भारत में सार्वभौम प्राथमिक शिक्षा लक्ष्यों को 2050 तक, सार्वभौम माध्यमिक शिक्षा लक्ष्यों को 2060 तक और सार्वभौम उच्च माध्यमिक शिक्षा लक्ष्यों को 2085 तक हासिल किया जा सकेगा। यूनेस्को की इस रिपोर्ट को माने तो, अगर वर्तमान रफ्तार से चलेंगे तो वैश्विक शिक्षा प्रतिबद्धता को हांसिल करने में भारत पचास साल पीछे रह जाएगा।

इससे पता चलता है कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के क्षेत्र में हमारी स्थिति क्या है। दुनियां शिक्षित होने की दिशा में सरपट दोड़ लगा रही है और हम हैं कि पूर्ण साक्षर राष्ट्र होने के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहें हैं।

बात पहले साक्षरता की हीं कर लें, भारत में अगर कोई व्यक्ति अपना नाम लिखने और पढ़ने की योग्यता भर हांसिल कर लेता है तो उसे साक्षर माना जाता है। साक्षरता के इस मानक पर सवाल ये उठता है कि क्या साक्षर होने भर से काम हो जाएगा ? क्या सामाजिक आर्थिक असामनता से मुक्ति बस इतने से मिल जाएगी की कोई अपना नाम भर लिखना-पढ़ना जान जाय ? क्या इससे देश की प्रगति का चक्र गतिमान हो जाएगा ? क्या इतने भर के बदलाव और सुख-समृद्धि की बयार बहने लगेगी ?

विंडबना तो ये है कि साक्षरता के मामूली से मानक के पैमाने पर भी देश की लगभग 26 प्रतिशत आबादी अब भी निरक्षरता के दायरे में है। और अगर हम साक्षरता के 100 प्रतिशत आंकड़े को भी पा लें, तो भी इससे देश का भला नहीं होने वाला। वस्तुतः संपूर्ण आबादी में साक्षरता लाने की तुलना तो बस जूगनु की रोशनी से हीं कि जा सकती है, इससे जीवन का अंधकार नहीं मिटने वाला। यथार्त तो ये है कि ऐसी साक्षरता के बहाव में संपूर्ण विकास के लक्ष्य की नाव को पार लगाना संभव नहीं।

विरासत में मिली शिक्षा नीति एक ऐसे दृष्टिकोण को लेकर चल रही है, जो इस बात से ज्यादा प्रभावित लगती है कि साक्षर कर देने मात्र से व्यक्ति आगे की शिक्षा के अवसरों का लाभ उठाने के योग्य् हो जाता है, और समाज की चुनौतियों का सामना करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होता है। लेकिन परिणामों का आकलन यही इंगित करता है कि इस ओर हमें बहुत कुछ करने की जरुरत है।

साक्षरता से कई कदम आगे बढ़कर गुणात्मक शिक्षा देने हेतु जमीन तैयार कर लोंगो को शिक्षित करने की जरुरत है। इतनी और ऐसी शिक्षा तो जरुर मिले की व्यक्ति दैनिक जीवन से जुड़े हुए अपने कागजी कार्यों का निष्पादन स्वंय कर सके। हित या अहित को पढ़ कर समझ सकें। तभी सही मायने में समाज और देश का भला होगा। अतः जरूरत तो इस बात कि है कि साक्षरता के मानक और परिभाषा को बदली जाय, क्योंकि केवल साक्षर बना देने से कुछ हांसिल नहीं होगा।

इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है कि अशिक्षा के कारण समाज समस्याओं के दुष्चक्र में फंस जाता है। जनसंख्या बृद्धी दर से इसका सीधा संबंध तो है हीं, साथ में सरकारी योजनाओं की विफलता का मूल कारण भी है। इससे सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई भी बढ़ती है। परिणाम स्वरुप उत्तपन्न असंतोष से कई सामाजिक समस्याएं और बढ़ते अपराध का खामियाजा भी देश को भुगतना पड़ता है। अशिक्षित गरीबों का शोषण होता है और तो और देखने में यह भी आया है कि आदिवासी इलाके में शोषण, धर्मांतरण, सरकारी सहायता का लाभ न ले पाने का मुख्य कारण शिक्षा का अभाव हीं है।

हांलाकि शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए गए। बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून को 2010 से लागू किया गया । इस कानून के तहत व्यव्स्था की गई कि छह से चौदह वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना हर राज्य की जिम्मेदारी होगी और हर बच्चे का मूल अधिकार होगा। इस कानून को साक्षरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना गया। लेकिन इन सबके बावजूद भी देश में प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर में कोई खास गुणात्मक बदलाव देखने को नहीं मिला।

देश में ऐसे कई दुर्गम और निर्जन क्षेत्र हैं जहां रह रहे लोगों को न्यूनतम आवश्यकता की वस्तुएं तक नसीब नहीं। सड़क, पानी बिजली, स्कूल, अस्पताल, जैसी सुविधाओं के बाट जोहते लोगों की पीढ़िंया गुजर गई हैं। ऐसे में दुनिया में सबसे अधिक अनपढ़ जनसंख्या लिए भारत में पूर्ण साक्षरता से आगे संपूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को पाना कठीन तो है लेकिन असंभव नहीं। दरकार तो इस बात पर जोर देने कि है की, क्या किया जाए ताकि हम साक्षरता से आगे संपुर्ण शिक्षा के अयाम को हांसिल कर लें। नहीं तो वर्तमान हालात में हमें 50 वर्ष पीछे होंगें, जैसा युनेस्को की रिपोर्ट में है।

पूर्ण साक्षरता और गुणात्मक शिक्षा के लक्ष्य में जो बाधाएं हैं उसे पार पाने के उपाय तलाशने होंगे, जिसके तहत नए स्कुलो का निर्माण करना, छात्र शिक्षक अनुपात के अंतर को कम करना, प्रशिक्षित शिक्षकों की नयूक्ति पर बल देना, शिक्षा के अभिनव तरीकों को अपनाना होगा। गरीबी के कारण कोई बच्चा शिक्षा से बंचित न रह जाए, इसके लिए किए जा रहे उपायों जैसे आंगनबाड़ी, पोशाक वितरण, मुफ्त किताबें और मिड जे मिल जैसी योजनाओं में हो रही अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को सख्ती से निबटना होगा, संसाधन की कमी न हो इसके लिए बढ़ती जनसंख्यां पर भी काबू पाने की जरुरत है। माता-पिता की मानसिकता को बदलने के लिए जागरुकता कार्यक्रम के अभिनव तरिकों को अपनाया जाय। प्रत्येक स्कूल में एक प्रशिक्षित परामर्शदाता की नियूक्ती की जाय जो बच्चों के साथ-साथ माता पिता की काउन्सलिंग करे जिससे ड्रापआउट रोका जा सके। प्राकृतिक आपदाएं जैसे कि बाढ़ और सूखे के चपेट में आने वाले क्षेत्रों के लिए अलग से कारगर शिक्षा व्यव्स्था की जाय। देखा गया है कि बाढ़ क्षेत्र के स्कूल दो से तीन महीने तक बंद हो जाते है जिसका असर बच्चो की शिक्षा पर पड़ता है। सरकार के सामने ये तमाम चुनौतियां है जिसका सामना ठोस नीति लाकर करनी पड़ेगी।

हाल हीं में नीति आयोग के ट्रांसफर्मिंग इंडिया पर प्रथम वार्षिक व्याख्यान के दौरान, संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भारत को अब क्रमिक विकास का नहीं, कायाकल्प की जरुरत है। यह तब तक संभव नहीं है जब तक प्रशासनिक प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन न हो । लिहाजा नई सोच, नए संस्थान और नई तकनीक अपनानी होगी। रत्ती-रत्ती प्रगती से काम नहीं चलेगा, ठोस नीति से बदलने की कोशिश होनी चाहिए। ठीक यही बात निरक्षरता और अशिक्षा के घने कोहरे से निकाल कर संपूर्ण आबादी में शिक्षा का अलख जागाने के लिए भी अपनाना होगा।

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की 50 वी वर्षगांठ पर इस वर्ष य़ुनेस्को का थिम “रिडिंग द पास्ट, राईटिंग द फ्यूचर” है जो कि 2030 के सस्टेनबुल डेवेलेपमेंट एजेंडा को साकार करने की ओर एक कदम है। भारत को भी अब साक्षर होने के लक्ष्य से आगे बढ़कर शिक्षित होने के लक्ष्य की ओर मजबूती से कदम बढ़ाना चाहिए। अतः तमाम पहलुओं को ध्यान में ऱखते हुए, सरकार द्वारा जो नई शिक्षा नीति की ड्राफ्ट तैयार की जा रही है, उसमें ठोस और कारगर उपायों का आधार रखने उम्मीद की जानी चाहिए।

लेखक-विकास सिंह (स्वतंत्र पत्रकार)

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