सन्नाटा क्यों पसरा है वामपंथी खेमे में । Left politics in India

2014 को फतह करने की जोर आजमाईश है। चुनावी चिल्ल-पौं मचा है। सबसे बड़े लोकतंत्र का उल्लास पर्व मनाया जा रहा है। नहले पर दहले का दांव ताबड़तोड़ चला जा रहा है। तमाशा सजा है। राजनेता जमूरा बने हैं। शोर मचा मचाकर वोटर को लुभाने, खिंचने और रिझाने का मजेदार चक्कर चल रहा है। सच्चा- झूठा साबित करने की प्रतिद्वंदिता छिड़ी है। इस शोरगुल में एक आवाज फीकी पड़ी है। यह फीकी आवाज है, वामपंथी दलों की। गरीब मजदूरों के हित के लिए उठने वाली वैचारिक आवाज को लेकर काम्युनिस्ट नेता मैदान से गायब हैं।

पूंजीपतियों से मजदूरों को बचाने। भूमिहीनों को सम्मान दिलाने । किनारे खड़ी आबादी को मुख्यधारा से कटने से बचाने। पीड़ितों के खिलाफ उठने का आग्रह रखने वाले लोग खुले में नजर नहीं आ रहे। सुगढ संगठन के जरिए चुनावी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर काबिज होने और सत्ता परिवर्तन की उम्मीद जगाने वाली आवाज गुम क्यों है? आखिर इस आवाज को क्या हो गया है ?

कॉमरेड प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, एबी वर्धन, सुधाकर रेड्डी और दीपांकर भट्टाचार्य जैसे तमाम दिग्गज मीडिया कवरेज से पूरी तरह दूर हैं। दूर तो मायावती भी रहती हैं, पर विशाल रैलियों की वजह से मीडिया उनको नकार नहीं पाता। वोटिंग मशीन के नतीजे से वह चिख चिल्लाकर वोट मांगने वालों को बेकार साबित करती नजर आती रही हैं, तो क्या पश्चिम बंगाल से बेदखल होने की वजह से ही पूरी हिंदी पट्टी से वामपंथी आवाज गुमसम हुआ पड़ा है ? कामरेड वृंदा कारत या सुहासिनी अली के किसी बड़े धरने प्रदर्शन के लिए वामपंथ समर्थक तरस रहे हैं। गुबार निकालने के लिए प्रतिनिधि नहीं मिल रहा। केजरीवाल से काउंटर करने वाली कोई बात नहीं हो रही। मोदी के बढते रथ को थामने का जुगत नहीं बैठाया जा रहा। राहुल गांधी के अभ्युदय के खिलाफ वंशवाद पर चोट करने वाला हथौड़ा नहीं चलाया जा रहा। ममता की मर्दानगी ने घिग्घी बांध दी है। इस चुनाव मे काम्युनिस्ट अपने एजंडे को लेकर ढोल मजिरा नहीं बजा रहे। बजा भी रहे हैं, तो दिल्ली तक उनका कोई शोर नहीं पहुंच रहा।

वामपंथी नेता की उन दलीलों को समझना होगा जिसमें काम्युनिस्टों को कभी भी चुनावी शोर में नहीं फंसने की बात कही जाती है। हालांकि इस बात के पीछे खुद की दुर्दशा छिपाने का यत्न ज्यादा नजर आता है। अक्सर बताया जाता है कि काम्युनिस्ट उम्मीद्वारों के लिए उनके जमीनी कैडर महत्वपूर्ण होते हैं, जो सिर्फ चुनावी मौसम में दिखावा करने के बजाय अनवरत काम करते रहते हैं। अगर ऐसा है, तो ठीक है। काम्युनिस्टों का जनतांत्रिक व्यवस्था में आग्रह बना रहना चाहिए।

अगर ऐसा नहीं है, तो खतरनाक है। इस कठोर सत्य की पड़ताल करनी चाहिए कि कॉमरेड के घुप चुप्पी की क्या वजह है। कहीं ऐसा तो नहीं कि चुनावी प्रक्रिया के जरिए जनतांत्रिक वामपंथी व्यवस्था कायम करने का आग्रह कमजोर पड़ता जा रहा है ? यह सोचनीय है। ऐसे में, खालिस वामपंथ के नाम पर वही बचेंगे जो अतिरेक के शिकार हैं। जिनको बात मनवाने की जिद में दुर्दांत हथियारों के इस्तेमाल से कोई गुरेज नहीं। वो थम ठोंकर लाल सलाम करने को मजबूर करते हैं। उनके लिए विचार के आगे इंसान की जिंदगी का कोई मतलब नहीं। संघर्ष के नाम पर उनके हाथ खून से सने हैं। प्रशासन की मदद से लेवी वसूली ने इनके इमान पर ग्रहण लगा रखा है।

सच बर्दाश्त हो,तो कहूं वक्त ने करवट बदल ली है। गांधी के देश में इस सोच का कोई मतलब नहीं कि सत्ता बैलेट से नहीं बुलेट से आती है। वामपंथ के उग्र और अराजक स्वरूप ने हालात खराब कर दिया है। बीते शताब्दी के उत्तर मध्य में वामपंथी विचार की धमक कमजोर पडती जा रही है। बातों और किताबों से वामपंथ को जमीन पर उतारने की पहल शिथिल पड़ गई है। वामपंथ के नाम पर बस उग्रवाद नजर आ रहा है। उनकी ही धमक सुनी जा रही है जो व्यवस्था से बुरी तरह हताश हैं। निराश हैं। फ्रस्टेटेड हैं। शातिर लाईंड माइन्स से सुरक्षा बल शहीद हो रहे हैं। राजनेताओं के साथ आम लोगों की जान ली जा रही है। छोटी सी बात उनके जेहन में नहीं बस रहा कि जब जीवन नहीं, तो व्यवस्था बदलने की आसक्ति किसके लिए ? जाहिर तौर पर इसके लिए राजनीति की धारा में शामिल वामपंथी पुरोधा कसूरवार हैं।

अतिरेक के शिकार वामपंथी चक्रव्यूह में फंसे हैं। अनगढ़ हीरोईज्म के सहारे थोड़ा बहुत बन पा रहा है, तो समानांतर सत्ता की जिद पाल ली है। वैचारिक ग्रहण के शिकार कुछ लोग रॉबिनहुड बनकर मांद में घिरे हैं। वामपंथ से प्रभावित दायरे को बचाने के लिए जान की बाजी लगा रखी है। माओत्सेंग को याद कर बेमकसद गोरिल्ला बना जा रहा है। बंदूक और बारूद के जोर पर भयभीत प्रशासन को आदिवासियों के गांवों तक नहीं पहुंचने दे रहे। अतिवामपंथ के दलदल में फंसकर महाराष्ट्र के गढ चिरौली, छतीसगढ का बस्तर, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल में जंगलमहल के कई गांव, पर्वत,पहाड़ अतिवादी वामपंथियों का बसेरा बना है। विकास की औषधी से दूर के टापू बने इन इलाकों में पोलिंग पार्टी का पहुंचना दुरूह बना है। यहां सरकारी डाक्टर, शिक्षक और कर्मचारी सिर्फ कागजी खानापूर्ति में पहुंचा करते हैं। इनसे मतदान कराना बड़ी चुनौती बनी है। चुनाव आयोग के पहली बार आजमाए जा रहे “नोटा” वटन को इन गरीबों तक पहुंचाना मुश्किल है। उम्मीद्वारों को खारिज करने वाले प्रावधान का इस्तेमाल भी ये तब ही कर सकते हैं, जब इनतक वोटिंग मशीन को पहुंचाना संभव हो।

तथाकथित कॉमरेड़ों की दबंगई के आगे लोकतांत्रिक मूल्यों की बलि चढ रही है। देश वामपंथ के अतिरेक की बड़ी कीमत चुकाने को मजबूर है। फंसे लोगों के मुख्यधारा में लौटने का रास्ता बंद हुआ जा रहा है। केंद्र सरकार की ओर से अतिवादी संगठनों की प्रतिबंधित सूची में डाले जाने के बाद से इन अतिरेक वामपंथियों को देशद्रोही की श्रेणी में शुमार किया जा चुका है। इनको रास्ते पर लाने की जिम्मेदारी किसी की बनती है या नहीं, ये समझ से परे होता जा रहा है।

तीन राज्यों की सत्ता पर वामपंथी राजनीतिक दलों का आधिपत्य रहा है।  पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा। इन तीनों राज्यों से कुल 64 लोकसभा की सीटें हैं। लोकतांत्रिक इतिहास में वामपंथी दलों की सबसे बड़ी दखल 2004 में हुई थी। तब लोकसभा में साठ सांसद चुनकर पहुंचे थे। 545 सदस्यों वाले लोकतंत्र के मंदिर में औसतन 30 से 35 वामपंथी पार्टी के उम्मीद्वार आते रहे हैं। जाहिर तौर पर 2004 के प्रदर्शन श्रेय मरहूम कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु और इंद्रजीत गुप्ता की तैयार की गई व्यूह रचना को जाता है। उसके बाद घुर कांग्रेस विरोध पर खड़े प्रकाश करात के हाथ सीपीएम की चाभी आई। लोकतांत्रिक वामपंथी दलों में सीपीएम सबसे बड़ी पार्टी है। महासचिव बनने के बाद उन्होने सबसे प्रभावशाली काम यूपीए की सरकार से समर्थन वापस लेने का किया। शायद इसी दांव में वो गच्चा खा गए। अमेरिका से परमाणु डील पर मनमोहन सरकार तो नहीं गिरी पर कांग्रेस ने 2009 के चुनाव में सीपीएम का सूपड़ा साफ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की सत्ता की चाभी का मिलना कांग्रेस की उसी ढेड़ी नजर का नतीजा हैं। केरल की वामपंथी सरकार भी जाती रही। रिक्शे पर चलने वाले मुख्यमंत्री मानिक सरकार ने सादगी के बूते छोटे से प्रांत त्रिपुरा में सीपीएम के गढ़ को जरूर बचाए रखा है।

दिल्ली में यह समझना मुश्किल है कि आखिर किस विचारधारा के अंतर की वजह से सीपीएम और सीपीआई ने अलग अस्तित्व बनाए रखा है । मोटी समझ बताती है कि यह पॉश इलाके में बने आलीशान अजॉय भवन और गोपालन भवन को बचाए रखने की जुगत है। सात किलोमीटर की दूरी पर बने इन दोनों पार्टियों के मुख्यालयों में कई बार जितने कमरे हैं उतने लोग भी नजर नहीं आते। तीक्ष्ण तेवर के लिहाज से लक्ष्मीनगर के छोटे से मकान से चलने वाली दीपांकर भट्टाचार्य की पार्टी सीपीआई एमएल बेहतर नजर आती है। हालांकि अंदरूनी लोकतंत्र के लिहाज से इनका चेहरा धुंधला है। सीपीआई में निरंतर महासचिव बदलने की प्रक्रिया इमानदारी से चलती रही है। सीपीएम में सीताराम यचुरी को महासचिव चुनाव में प्रकाश करात ने जिस तरह शिकस्त दी थी, वो बताती है कि लोकतंत्रिक प्रक्रिया पर कॉमरेडों का यकीन कायम है। आईपीएफ से नाम बदलकर सीपीआई एमएल में महरूम कॉमरेड विनोद मिश्र के निधन के बाद से महासचिव की कुर्सी को दीपांकर भट्टाचार्य निरंतर सुशोभित कर रहे हैं।

वामपंथी दल के चुनावी सुर गुम हैं। एकओर मोदी की हुंकार, केजरीवाल की ताल, राहुल, जयललिता, मुलायम, नीतिश की अपने अपने तरीके से दिल्ली की दावेदारी की आवाज जारी है। लेकिन देश के सत्ता की कुर्सी थामने के ख्वाब पर वामपंथ चुप है। यकीन नहीं हो रहा कि ये वही वामपंथी दल हैं, जिसने प्रचंड बहुमत वाले राजीव गांधी की सरकार को आईना दिखाने का काम किया था। 1989 में वीपी सिंह की सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। कांग्रेस को बेदखल कर 1996 में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनाई। कॉमरेड इंद्रजीत गुप्त बड़े वसूल वाले गृहमंत्री बने और साबित कर गए कि कॉमरेडों में भी देश चलाने का शऊर है। वामपंथियों ने 2004 में साठ लोकसभा सीटों पर कब्जा किया था। एनडीए के हाथों से सत्ता की कमान को छीन कांग्रेस के हाथों में थमाने का उपक्रम करना मुनासिब समझा। यूपीए वन की सरकार वामपंथी दलों के आसरे ही बनी थी लेकिन दस साल में अब तस्वीर उलट गई है। इसबार तैयारी और शोरशराबे से नेताओं की दूरी को देखकर लग रहा कि वामपंथी दलों के सांसद शायद ही संसद में अबतक के न्यूनतम आंकड़े को लोकसभा में छू पाएंगे।

– आलोक कुमार (लेखक- वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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