कानून के नाम पर बंटता समाज ।LAW and SOCIETY

कानून बनाने के पीछे मूल उद्देश्य तो यह होता है कि अपराध रुके, सबको न्याय मिले, समता मूलक समाज की स्थापना हो, लेकिन जब उसी कानून का दुरुपयोग होने लगे तो व्यक्ति और समाज कुंठाग्रस्त और आक्रोशित होने लगता है। ऐसे में, खासकर उन क़ानूनों को लेकर जिसका पूरे समाज पर असर होता हो, सरकार को संवेदनशीलता के साथ तार्किक निर्णय लेना चाहिए ।

आज कानूनी प्रावधानों और सरकार के निर्णयों को लेकर देश भर में समाज बटा हुआ दिखाई दे रहा है। आंदोलन पर उतारु हैं। चिंता कानून के दुरुपयोग को लेकर ज्यादा है । महिला उत्पीड़न, दहेज प्रताड़ना, जातीय और धार्मिक उत्पीड़न के कानून के तहत झूठे मुकदमे दर्ज कर कानून का दुरुपयोग करने का मामले बढ़ रहे हैं,  और नेशनल क्राईम ब्यूरो के आंकड़े भी इस और इशारा करते हैं।

दहेज़ कानून के दुरुपयोग को हीं देखें तो इसको लेकर जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया कि केस दर्ज होते हीं गिरफ्तारी नहीं होगी आरोप पुष्ट होने पर हीं गिरफ्तारी हो। होता ये था कि आईपीसी की धारा 499A का दुरुपयोग करते हुए पत्नी या उनके परिवार द्वारा पति के माता-पिता, परिवार के नाबालिग बच्चों – बुजूर्गों समेत अन्य रिश्तेदार पर भी आपराधिक केस दर्ज करा दिया था। इस मामले में न्यायालय ने कहा की बेगुनाहों के मानवाधिकार का हनन करने वाले इस तरह की मामले की जांच की जाए। दहेज़ रोकथाम कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए माननीय न्यायालय ने गाइड लाईन जारी किया कि हर जिले में एक परिवार कल्याण समिति गठित की जाए और सेक्शन 499A के तहत की गई शिकायत को पहले समिति के समक्ष भेजा जाएगा। यह सीमित आरोपों की पुष्टि के संबंध में एक रिपोर्ट भेजेगी, जिसके बाद हीं गिरफ्तारी की जा सकेगी। कुछ इस तरह के कदम हीं उन संवेदनशील कानूनों को लेकर भी लिया जाना चाहिए, जिनका दुरुपयोग हो रहा है। बीच की एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जो पुलिस और न्यायालय जाने से पहले की हो, जिससे आरोप की सत्यता की शुरुआती जांच हो जाए और फिर आरोपी की गिरफ्तारी हो।

देखने में आ रहा है कि ग़लती करने पर भी वरिष्ठ अधिकारी अपने अधिनस्थ कर्मचारियों की ग़लती पर कार्रवाई करने से बचते हैं, उन्हें डर है कि कहीं वो किसी कानूनी पचड़े में न फँस जाएं। फँसा देने की धमकियां भी मिलने की बात तो आती हीं रहती हैं, कइयों को तो फँसाया भी गया । हाल हीं मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार ने तो पूर्व महिला कर्मचारी की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली। जाति के नाम पर फँसाने के तो मामले हैं हीं । इन हालात में नियोक्ता जात और जेंडर के आधार पर रोज़गार देने से परहेज करेंगे, शिक्षक छात्र को कुछ कहने से पहले सोचेंगे, कोई किसी अन्य जाति साथ मिलकर व्यवसाय करने से डरेंगें। और हो भी ऐसा हीं रहा है। काम देने से पहले लोग जात जानने की कोशिश करते हैं। दलित वर्ग के साथ सामान्य वर्ग का व्यक्ति व्यावसायिक सहभागिता नही करना चाहता । क्या इन परिस्थितियों में समाज ऊर्ध्वाधर दिशा में बढ़ सकता है, क्या इससे जातीय भेदभाव मिट सकता है, शायद नहीं।

लोगों की चिंता ये है कि झूठे मुकदमे करने वालों पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती जबकि उनके उपर केस होने पर तत्काल जेल जाने का प्रावधान कर दिया गया है। और जाति धर्म के नाम पर बने आयोग के सदस्य ज्यादातर एक हीं समाज के होते हैं तो लोगों को लगता है कि उनके साथ न्याय नहीं हो रहा। समाज में बदले की भावना से की गई कार्रवाई से लोगों को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानियों से गुजरना पड़ता है। निराशा और कुंठा जिन लोगों में घर कर रही है वो एकाएक नहीं है, गत वर्षों में हुई घटनाओं के कारण उन्हें लग रहा कि उन्हें कहीं से किसी प्रकार की प्रोटेक्शन नहीं है।  नतीजतन भेदभाव की खाई और गहरी हो रही है, हिंसक घटनाएँ बढ़ रहीं है, जातीय दूरियाँ कम होने के बजाय उसके बढ़ने की संभावनाएं प्रबल हो रहीं है। ऐसे में सरकार की ये जिम्मेदारी तो बनती है की इस तरह के तनाव को कम करे वरना सामाजिक ताना बाना टूटने का ख़तरा है।

लोकतंत्र में इस तरह की सामाजिक फूट और असहमति सेफ्टी वल्व साबित होने के वजाय विस्फोटक साबित हो सकता है। समता मूलक समाज की स्थापना के लिए कानून बनाने के साथ इस बात का भी प्रावधान किया जाना चाहिए कि इसका गलत उपयोग करने वालों को कठोर दंड मिले। साथ हीं कमजोर वर्ग को तरक्की का मार्ग मिलना चाहिए उसे हर प्रकार के उत्पीड़न से बचाना चाहिए । इसके लिए लोगों की सोच बदलनी होगी, ऐसी योजनाएं शुरु करनी होंगी जिनमें सभी वर्ग के लोग साथ मिलकर कुछ करें, लेकिन किसी को ये डर ना हो कि किसी भी प्रकार के विवाद होने पर जातीय या जेंडर उत्पीड़न का नाम देकर फंसा दिया जाएगा।

दहेज़ प्रथा, जातिवाद, महिला उत्पीड़न जैसी समस्याओं को खत्म करने के लिए कठोर कानून के साथ-साथ जागरुकता और व्यवहार परिवर्तन की जरुरत है, ऐसा माहौल और अवसर देना होगा की अलग-अलग चलने के वजाय साथ-साथ चलें, नीतियों का निर्धारण ऐसा हो की कोई समाज कुंठित न हो, उन्हें ये ना लगे की सरकारी नीतियों की वजह उनको परेशानी उठानी पड़ रही है, या उनके समाज को हाशिए पर रखा जा रहा है।

सरकार को भी सोचना होगा कि भले हीं एक समाज सदियों से पिछड़ा रहा है लेकिन वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जो आज की परिस्थिति में दाने- दाने का मोहताज है, उसे भी सामाजिक सुरक्षा की जरुरत है उसे भी सकारात्मक डिस्क्रिमिनेशन के दायरे मे लाया जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो बिखरा हुआ समाज जुड़ेगा नहीं ।

आज पक्ष-विपक्ष हिंसक आंदोलन करने को उतारु हैं जिससे देश का भला नही होने वाला। राजनीतिक दल भी अपनी सुविधानुसार बयानबाज़ी कर इस तरह के आंदोलनों को हवा दे रहें हैं। कोर्ट के न्यायसंगत फ़ैसलों का सम्मान करना चाहिए, उसे राजनीति की राड़ में फांसने से बचना चाहिए ।

(बिकास सिंह) 

©The NGO Times

Leave a Reply

error: Content is protected !! Plz Contact us 9560775355

You have successfully subscribed to the newsletter

There was an error while trying to send your request. Please try again.

The Ngo Times will use the information you provide on this form to be in touch with you and to provide updates and marketing.

इस website को अपने ईमेल से सब्सक्राईब कर लें ताकि नई जानकारी आपको समय पर मिल सके। यह पुर्णतः निःशुल्क है।