सरोकार बढाने के लिए जरूरी है परिवारिक खेती। importance of Family Farming

 


डॉ. चद्रपॉल सिंह यादव

संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) ने मौजूदा वर्ष को परिवारिक खेती (Family Farming) के लिए समर्पित किया है। हम कृषि प्रधान देश से हैं। पश्चिम और अपने यहां खेतिहर परिवार की अवधारणा में मौलिक अंतर है। अपने यहां सफल खेतिहर परिवार एकल नहीं है। इसलिए अपने यहां परिवारिक खेती मतलब एकल परिवार के लोगों को विस्तृत परिवार की जरूरत का ख्याल कराने और दैनिक मजदूरी भत्ता का बचत कर लेने तक सीमित नहीं है। अपने यहां परिवारिक खेती का मतलब आंगन,समाज, गांव एवं परिवेश से सरोकार का मसला है। परिवारिक खेती के प्रोत्साहन को हम समाज की जरूरतों को केंद्र में रखकर की जाने वाली खेती का रूप दे सकते है। आंगन और समाज में सबके लिए सोचना और करना सहकारी चिंतन का आधार है। इसमें एकल परिवार के बजाय समाज को समाहित करने की बात होनी चाहिए। परिवार ही नहीं गांव के परिवारों के बीच संयुक्त उद्यमिता के तहत खेती की जाए।

मेरी समझ से अपने यहां एक साथ सर्वउत्थान की सोच से की जाने वाली खेती ही परिवारिक खेती कहला सकती है। परिवारिक खेती को ग्राम और समाज के दायरे में विस्तृत कर हम बोआई के वक्त खुद का लाभ नहीं बल्कि समाज और गांव की जरूरतों का चिंतन शामिल कर सकते हैं। सहकार विकसित दुनिया के लिए चौंकाने वाली हो सकती लेकिन हम ग्रामीण भारतीयों के लिए आम व्यवहार की बात है। मसलन गांव में एक परिवार अगर कद्दू की लत्ती लगाता है, तो दूसरा समझदारी से उनकी नकल करने से बचता है। दूसरे किस्म के सब्जी की लत्ती लगाता है। ये लत्ती जब एक साथ फलना शुरू होते हैं, तो खपत की जरूरत के लिए गांवों में जीवित वॉटर परंपरा पोषित होने लगती है। इससे स्वाद के एकरसता की निरसता से छुटकारा पाया जा सकता है। खाद्य सुरक्षा के दौर में इस मौलिक व्यवस्था को परिवारिक खेती के नाम पर विस्तार दिया जा सकता है।

हमारे गांव “अतिथि देवो भव” की परंपरा के निर्वाह के अनुपम उदाहरण हैं। एक घर का मेहमान समूचे समाज का मेहमान होता है। साझा सोच के तहत गांव के बड़े बुजुर्ग भावी ब्याह शादी का ख्याल कर भी बागवानी और खेती करने का परामर्श देते हैं। ब्याह- बारात के समय समाजिक जरूरत के तहत दलहन, सब्जी और अनाज की पैदा करने के लिए साझा मेहनत की जाती है। यही वजह है कि विपन्नता के बावजूद बेहतर आंगन-गांव-समाज में कोई भूखा नहीं सोता है। गांव में आया मेहमान पूरे गांव की इज्जत होता है। सामाजिक उत्सव के वक्त परिवारिक खेती की वजह से रंग बिरंगे पकवान का उपभोग संभव होता है। परिवारिक खेती की अहमियत गांवों को बाजार के आगोश से बचाए रखने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए है। सब्जी एवं अनाज महंगे होते जा रहे है इसलिए भी बाजार पर निर्भरता कम करने की जरूरत है। गांधी जी ने कहा था कि अपना नियंता खुद होना चाहिए, अपना काम खुद करना चाहिए। इसी तरह परिवारिक खेती के जरिए समूचे आंगन, गांव एवं समाज के आपसी तालमेल से बाजार की मंहगाई से निजात पाया जा सकता है।

परिवारिक खेती को बढ़ावा देने का संदर्भ महत्वपूर्ण है। आपसी बंटवारे से खेतों का आकार घटता जा रहा है। आबादी के विस्तार के साथ खेतों का आकार अपने यहां ज्यादा ही छोटा होता जा रहा है। यह खेती के अलाभकर होने की बड़ी वजह है। परिवारिक बंटवारे का सीधा असर खेतों पर पड़ता है। मेड़ें बढती जा रहे हैं। पिता जितने बड़े खेत में हल चलाया, पुत्र उससे छोटे खेतों में ट्रैक्टर चलना पड़ रहा है। खेतों की सिंचाई का काम एक ड्रिलिंग मशीन से संभव है। फसलों की कटाई और छटाई के लिए आधुनिक उपकरणों का फायदेमंद इस्तेमाल खेतों के समुचित आकार में ही संभव है। छोटे खेतों से उपज और रखरखाव पर लागत ज्यादा है। ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है कि खेत बड़ा हो, मिलकर खेती की जाए। खेतों की जमीन के बजाए उपज में साझेदारी सुनिश्चित की जाए, तो लाभ की संभावना प्रबल होगी। इसका मनोवैज्ञानिक लाभ मिलेगा। समाज में समरसता कायम होगी। सहअस्तित्व की भावना प्रबल होगी। इसपर अमल करने का एकमात्र उपाय पूरखों का ख्याल कर खेतों के बंटवारे से बने मेड़ को खत्म करने से होगा। खेतों के आकार को बड़ा बनाना होगा। मेड़ों को पाटने से खेतों की उपज बढाना संभव है। मेड़ों में बंटी खेतों को उत्खनित करने, पाटने, बीज रोपने, सिंचित करने और कटाई में दिक्कत आती है।

परिवारिक खेती के प्रोत्साहन वर्ष में सबक लेने की जरूरत है। परिवारिक खेती की महत्व को जरुरत के संदर्भ में समझना होगा। इससे साझा खेतों के प्रति बढती जा रही उदासीनता को कम करने में मदद मिल सकती है। खेती का रिश्ता मानव सभ्यता के विकास से है। इतिहास पलटकर देखने पर पता लगता है कि खेती और मानव सभ्यता का विकास एकसाथ चलता रहा। जब पूरे विश्व की आबादी महज सात करोड़ थी, तब खेती के विकास की क्षमता सिर्फ सात करोड़ लोगों को भोजन देने लायक भर थी। अब आठ अरब के करीब पहुंच गई है, तो हमारी क्षमता में अरब गुने की बढोत्तरी हुई है। खेती से आठ अरब लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। दुग्ध उत्पादित हो रहा है। मत्स्य पालन हो रहा है।

विकास की तालमेल भरी शाश्वत रफ्तार अतुलनीय है। जनसंख्या विस्फोट के प्रकोप से इंसान को धरती की उर्वर क्षमता ने सम्हाल रखा है। वैज्ञानिकों के नित नए शोध ने इसे सम्हालने का काम किया है। सीमित भूखंड में खद्यान्न उत्पादन के रिकार्ड दर रिकार्ड बनाए जा रहे हैं। बहुफसली खेती को लेकर जरूरत के मुताबिक संशोधन हो रहा है। सकारात्मकता कायम है। भविष्य का ख्याल किया जा रहा है। आज के दोहन पर चिंता जताई जा रही है। सावधानी बरतने पर जोर है। एहतिहाती कदम उठाए जा रहे हैं। इसी सोच के तहत पारिवारिक खेती के संदर्भ को विस्तार देने की जरूरत है। पारिवारिक खेती के जरिए बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने, पहाड़ी इलाकों में खेतों को तैयार करने, वन संपदा की रक्षा आदि पर जोर दिया जाए। खेती के लिए नए भूक्षेत्र का विकास करने वाले कर्मठ परिवारों को प्रोत्साहन मिले। विपरीत हालत में खेती करने वाले परिवारों को विशेष मदद की जरूरत है।

बढती आबादी के हिसाब से मौजूदा खेतों पर ज्यादा अन्न उत्पादन का दबाव है। नए खेत बनने से यह दबाव कम होगा। सरकारी अनुमान के मुताबिक अपने देश के कृषि क्षेत्र में समुचित उत्पादन क्षमता की कमी है। इसके लिए बच्चों में कृषि विज्ञान के प्रति रुझान पैदा करने की जरूरत है। नए प्राद्योगिकी को व्यवहार में लाना होगा। खेती के साथ मवेशी पालन, मत्स्य पालन और दूग्ध उत्पादन का भविष्य उज्जवल है। बढती आबादी के लिए दिन ब दिन इनका बाजार समृद्ध होता जाएगा। इसके लिए अध्ययन और नए बेहतर तरीकों को आजमाने की हमारी कमी को पारिवारिक खेती के प्रोत्साहन से पूरा किया जा सकता है।

(लेखक- National Cooprative Union of India के अध्यक्ष हैं)

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