बिहार के विकास मॉडल की ललाट पर गुरबत की लकीरें । Backwardness and Underdevlopment in Bihar’s Flood Prone Areas

विपरीत परिस्थिति में जी रहे बिहार के दियरा के लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. विकास की बाट जोहते तो पीढियां गुजर गईं, लेकिन हिस्से आई सिर्फ गुरबत की जिन्दगी और बाढ़ का कहर। नतीजा ये है कि अब जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के नाम पर नक्सली दियरा जल क्षेत्र में पैर जमाने के लिए पूरी ताकत से जुट गए हैं

बिहार के दियारा क्षेत्र के लोगों की हालत इक्कीसवीं सदी के नारों के दावों पर किसी तमाचे से कम नहीं है। बुलेट ट्रेन का सपना देखने वाले इस देश में दियारा का इलाका बदहाली की नई कहानी कहता है, जहां विकास के नाम पर बैलगाड़ी तक नसीब नहीं है। सालों से बाढ़ की मार झेलते हुए शापित जीवन जीने को मजबूर दियारा के लोगों को आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं, विकास नहीं। ऐसा तब हो रहा है जबकि बिहार के 534 प्रखंडों में से 127 प्रखंड दियरा या टाल क्षेत्र में आते हैं। सहरसा, खगड़िया, चंपारण, भागलपुर, कटिहार और पूर्णिया जैसे कई जिले में फैला हुआ है दियारा। जहां हर साल गंगा, गंडक, कोसी, कमला और बागमती जैसी नदियां कहर बनकर टूटती है। बदहाली के नियति मान चुके लोग अब किसी से शिकायत भी करने से बचते हैं। हालात की जुबानी तस्वीर पर यकीन ना हो तो कभी धमारा घाट स्टेशन जहां 19 अगस्त को रेल हादसे में 37 लोगों की मौत हुई थी, पर उतर कर दियारा के गांवों को देखें, हकीकत से सामना खुद ब खुद हो जाएगा।

दशकों से बाढ़ की विभीषिका झेलता आ रहा ये दियारा का इलाका जुलाई और अगस्त के महीने में जलमग्न हो जाता है। कोसों तक नजर आता है तो सिर्फ पानी ही पानी, जिसमें गांव किसी टापू जैसे ही दिखते हैं। स्टेशन के ठीक नीचे हीं नाव वाले नाव लगाकर रहते है, जैसे मुम्बई के गेटवे ऑफ इंडिया पर। आप नाव पर बैठिए और उतर जाइए गांव के किसी ऊंचे स्थान पर। जितना मजा गांव पहुंचने में आता है उससे बढ़कर सज़ा बाढ़ के समय गांव में रहने में भोगना पड़ता है। जिनका घर में पानी भर जाता है या डूब जाता है उन्हें दूसरों के घर मे शरण लेनी पड़ती है. खाद्यान्न की कमी के कारण भूखे पेट सोने तक की नौबत आ जाती है। हर वक्त आसमान में टक-टकी लगाए रहते हैं लोग, कि कब सरकार का कोई नुमाइंदा भगवान बनकर हेलिकॉप्टर से उड़ता हुआ आएगा और चावल-आटे का थैला या ब्रेड का पैकेट उपर से टपकाएगा। गर्भवती महिलाऐं और बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति हर वक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु बस किसी भी तरह बीत जाए ये बरसात का महीना। कुछ बुरा होने की आशंका होती है तो मां भगवती, मां कात्यायिनी से मन्नते रखते हैं, कि हे माई इस बुरे वक्त में नैया पर लगा दो, पाठा चढ़ाऐंगे, पांच ब्राह्मण को भोजन खिलाएगें आदि-आदि। कइयों पर तो माई की कृपा बनती है लेकिन कुछ को निर्दयी यमराज अपनों से छीन कर ले जाता है। बच्चे, खासकर नवजातों का हाल बुरा होता है। लाडलों के लिए दूध के लाले पड़ जाते हैं। अबोध बालकों को क्या पता, कि उसके बाप-ताऊ मवेशियों के लेकर दूसरे गांवों को चले गए हैं ताकि कम से कम वो पशुधन को तो बचा सकें। ये लोग अपने गांव को तभी लौटते हैं, जब खेतों में घास उगने लगती है और मवेशियों के लिए चारे का इंतजाम हो जाता है।

बाढ़ के महीने में महामारी फैलने का खौफ भी जेहन में होता है। क्योंकि ना तो यहां शौचालय के इंतजाम हैं और ना ही स्नानघरों की व्यवस्था, पीने के पानी की तो पूछिए मत। दवा के अभाव में ही कितनों की जिन्दगी भेंट चढ़ जाती है। असल मुसीबत तो बाढ़ का पानी उतरने के साथ सामने आती है। हर ओर कीचड़ और मरे हुए जानवरों की लाशें जहां चलना फिरना दूभर कर देती हैं तो वहीं आना जाना भी आसान नहीं होता। लगभग दो महीने सितंबर और अक्टूबर में लोग कीचड़ में पैदल रास्ते ही कहीं आ या जा सकते है। बीच रास्ते में पड़ने वाली छोटी नदियों में तो सीने तक पानी होता है, ऐसे में सिर पर समान उठाए, छोटे बच्चों को कंधे पर बिठाकर नदी पार करने को मजबूर होते हैं लोग।

सर्दी हो या गर्मी दियारा वासियों के लिए तो हर मौसम दर्द का मौसम होता है। गर्मी के महीने में स्टेशन से टायरगाड़ी, घोड़ा या फिर पैदल ही कच्चे रास्ते से लोग अपने-अपने घर पहुंचते हैं। अमावस्या की काली रात को तो लोग अपने से आगे जाने वाले की टोह लगाकर चलते हैं। हां जो टॉर्च की बैटरी अफोर्ड कर सकते हैं वो आगे-आगे बाकी पीछे-पीछे। बारिश के मौसम में रात के समय रास्ता और दूभर हो जाता है। लोग अंदाजा लगाते हुए खेत के बीच बने रास्ते से चल के जाते हैं, लेकिन अगर इस बीच जरा भी चूक हुई तो सामान के साथ सीधे कीचड़ में जा गिरते हैं और फिर उठते भी हैं तो अपने पूर्वजों को कोसते हुए कि कहां आकर बस गए थे।

दुनिया के लोग भले ही इनके हालात से अंजान हों लेकिन दियारा से बाहर क्या हो रहा है उससे बाख़बर रहने की हर संभव कोशिश करते हैं दियारावासी। लेकिन इसके लिए उनके पास इसका एक मात्र साधन रेडियो है, जिससे वो ख़बर भी सुनते हैं और अपना मनोरंजन भी करते हैं। हालांकि कुछ लोगों के पास मोबाइल है, लेकिन बिजली नहीं होने के कारण, उसकी बैट्री को चार्ज कराने के लिए गांव से करीब तीन-चार किलोमीटर दूर प्रखंड भेजना पड़ता है। गांवों की हालत ये है कि करीब 35 साल पहले यहां बिजली के खंभे तो लगाए गए। लेकिन बाढ़ उसे अपने साथ बहाकर ले गई। उसके बाद ना तो खंभे ही लगे ना बिजली मिली। यानी लालटेन युग में आज भी जी रहे हैं दियारावासी।

दियारावासियों की आर्थिक स्थिति खासी दयनीय है, कई परिवार ऐसे हैं जिनके पास तन ढंकने के लिए ढ़ंग के कपड़े तक नहीं है। बाढ़ के कारण किसान अपने खेतों में सिर्फ एक बार ही फसल उगा पाते हैं। तो कुछ लोगों का गुजारा केवल दूध बेचकर ही चलता है। इलाके के अधिकतर नौजवान रोजी-रोटी की तलाश में गांव से पलायन कर चुके हैं। लेकिन अच्छी शिक्षा के अभाव में वो केवल मजदूर बनकर रह गए। ज्यादातर लड़के-लड़कियां आठवीं क्लास से आगे की पढ़ाई नहीं पढ़ पाते क्योंकि स्थानीय स्कूल में उससे आगे की शिक्षा का इंतजाम नहीं है। जहां ठीक ढंग से शिक्षा का इंतजाम नही है, वहां के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधा की हालत क्या होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं. उदाहरण के तौर पर करीब आठ हजार की आबादी वाले ठुठ्ठी-मोहनपुर पंचायत में प्राइमरी हेल्थ सेंटर का अता-पता नहीं है। चिकित्सा व्यवस्था तो गांव के ही मैट्रिक पास एक शख्स के भरोसे है। पिछले पच्चीस-तीस सालों से वही बचाते आ रहे हैं लोगों की जान। बारिश हो या आंधी-तूफान, चिलचिलाती धूप हो या ठिठुरती रात, किसी वक्त कोई दे आवाज़ तो हाज़िर होता है ये मसीहा। सामान्य बीमारियों को तो वो अपने तजुर्बे से कंट्रोल कर लेता है, लेकिन स्थिति नाजुक हो तो फिर जान बचाने के लिए शहर की ओर भागना पड़ता है लोगों को। खटिये का स्ट्रेचर बना मरीज को चार कंधों पर उठाकर बदहवास तेज दौड़ते हुए ऐसे लोग नजदीकी अस्पताल पहुंचने की कोशिश करते हैं। रात हो तो ट्रेन भी नहीं मिलती जिसके कारण दूसरे रास्ते से जाना पड़ता है, और वो भी रास्ते में पड़ने वाली बागमती नदी को नाव से पार करके। कई बार ऐसा भी हुआ जब बीच रास्ते में ही मरीज की हालत बिगड़ जाने से मौत हो गई।

अशिक्षा, बेरोजगारी और साधनविहीन इस पिछड़े इलाके के लड़के-लड़कियों की शादी भी बड़ी मुश्किल से होती है। कोई पिता अपनी लड़की की शादी दियारा के गांव में करने से पहले सौ बार सोचता है। गांव कि लड़कियों की शादी के लिए भी एड़ी-चोटी एक करना पड़ता है। लड़केवाले भी ये सोचते हैं कि बारातियों को कहां पैदल दौड़ाएंगे इस दियारा में, और तो और लड़के को भी ससुराल आने के लिए खासी कसरत करनी होगी। एक वक्त ऐसा भी आया जब यहां लोग दूसरे गांव के लड़के को किसी बहाने गांव बुलाकर अपनी लड़की से शादी कर देते थे। जिसको स्थानीय भाषा में ‘पकड़उआ विवाह’ कहा जाता था। हालांकि वक्त के साथ लोगो की सोच बदली और ऐसे विवाद लगभग बंद हो चुके हैं।

कुल मिलाकर हालात यह है कि गरीबी, कुपोषण, शोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधा का अभाव, यातायात का कोई साधन नहीं, नदियों द्वारा कटाव, भू-क्षरण, बाढ़ से फसल की क्षति, विस्थापन का दर्द और नदी से मछली पकड़ने के लिए अक्सर होने वाली खूनी लड़ाई जैसी समस्याओं के कारण बदहाल जीवन जीने को मजबूर हैं दियारा के लोग।

अब तो नक्सलियों की धमक भी दिखने लगी है दियारा क्षेत्र में। लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर नक्सली अब यहां के लोगों को अपने साथ जोड़ने का कुचक्र रच रहे हैं। बिहार के पूर्वी और पश्चिमी चम्पारण जिले में तो इनकी मौजूदगी के कारनामे अक्सर अखबारों की सुर्खियां बनते रहते हैं। भागलपुर और खगड़िया जैसे जिले में भी लाल सलाम के नारे बुलंद करते हुए खेतों में लाल झण्डा लहरा कर अपने वजूद को साबित कर दहशत का दम दिखा चुके हैं नक्सली। अपने कारनामों को अंजाम देकर रात में नदी के रास्ते किसी जंगल में भाग जाते हैं ये लोग। नेपाल क्षेत्र से सटे इलाके में तो ये लोग वारदात कर नदी मार्ग से नेपाल भाग जाते हैं। सड़क मार्ग से तो इन्हें पकड़े जाने का डर होता है, लेकिन नदी मार्ग पर समुचित सुरक्षा का इंतजाम नहीं होने कारण उनके लिए यह रास्ता सबसे सुरक्षित और सुगम है। वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि दियारा क्षेत्र ‘ रीवर साइड रेड कॉरिडोर ’ के रुप में कुख्यात न हो जाए। जाहिर है सरकार को इस ओर ध्यान देते हुए सतर्क रहने की जरूरत है।

हालांकि जनवरी, 2011 में ही विश्व बैंक समूह की 259 मिलियन अमरीकी डॉलर की धनराशि की सहायता वाली ‘ बिहार कोशी फ्लड रिकवरी परियोजना ’ को अमरीकी मदद दिए जाने के कागजात पर दस्तखत हुए थे और अब तक 41.13 मिलियन अमरीकी डॉलर की धनराशि इसके तहत मिल चुकी है। इसका उद्देश्य बाढ़ के प्रभाव से उबरने, बाढ़ से भावी जोखिम कम करने, निर्माण कार्य और भावी आपदाओं की स्थिति में आपातकालीन प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा देना है। लेकिन विश्व बैंक की सहयोग से चलने वाली इस परियोजना का छंटाक भर लाभ भी यहां के लोगों को मिला हो ऐसा कहीं नज़र नहीं आता।

बिहार के पूरे क्षेत्रफल का लगभग 15 प्रतिशत दियारा क्षेत्र है, लेकिन विपरीत परिस्थिति में जी रहे इन दियारा के लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। यहां के लोग आज भी मध्ययुगीन जीवन जीने को मजबूर हैं। पानी, सड़क, अस्पताल और बिजली की बाट जोहते तो पीढियां गुजर गईं, लेकिन हिस्से आई तो सिर्फ मुफ्लिसी और बाढ़ की विभिषिका। विकास की लकीर तो खींच नहीं सकी सरकार, बदहाली की तस्वीर क्या बदलेगी, हालत ये है कि अब तो उम्मीदें भी खत्म सी होने लगी हैं कि कभी इस इलाके की सूरत बदल पाएगी। सरकार से उम्मीद यही है कि कम से कम यहां दियारा विकास बोर्ड का गठन करे और समस्याओं के समाधान के लिए कारगर कदम उठाए, ताकि पर्यटन की असीम संभावनाओं से भरा ये इलाका नक्सलवाद की भेंट ना चढ़े। पटना दरबार से दिल्ली दरबार तक किसी की नजरे इनायत अगर इस ओर हुई तो ये इस क्षेत्र के लिए किसी बड़ी राहत से कम नहीं होगा।

(विकास सिंह)

© The NGO Times

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