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कंपनियों की सांठगांठ से कचरा बीनने वालों के दिन तो नहीं फिरे, एनजीओ की चांदी जरूर हो गई।

इंदौर। कहां तो तय था कि कचरा बीनने वालों के अच्छे दिन आएंगे, मगर एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने निजी फैक्टरियों से मिलकर कर दिया उम्मिदों पर पानी फेर दिया। पहले प्राइवेट इंडस्ट्री वालों से प्लास्टिक खरीदकर रीजनल पार्क में इकट्ठा किया जाता है। फिर मौका देखकर इसे यहां से उठवा लिया जाता है। बाद में इसे सीमेंट कंपनियों को पहुंचा दिया जाता है। साफ है एनजीओ और कंपनियों की सांठगांठ से कचरा बीनने वालों के दिन तो नहीं फिरे, एनजीओ की चांदी जरूर हो गई।

हकीकत यह है जिन लोगों (कचरा बीनने वालों) के लिए योजना बनाई गई, वे खुद इससे अनजान हैं। उन्हें सार्थक एनजीओ का नाम तक नहीं मालूम है, जबकि एनजीओ का दावा है कि उसने 335 कचरा बीनने वालों का रजिस्ट्रेशन किया है।

शिकायत के मुताबिक सार्थक एनजीओ के लोग निजी फैक्टरियों से 1.5 रुपए प्रतिकिलो के भाव से प्लास्टिक खरीदते हैं। इसे सीमेंट कंपनियों को 5.50 रुपए प्रति किलो में बेचा जाता है। यानी प्रतिकिलो एनजीओ को चार रुपए बचते हैं, जबकि करार के मुताबिक एनजीओ को कचरा उठाने वालों से साढ़े तीन से चार रुपए प्रतिकिलो की दर पर प्लास्टिक खरीदना है। इसका कहीं पालन नहीं किया जा रहा था। निगम के नाम पर धोखाधड़ी की जा रही थी।


एनजीओ का कहना है सीमेंट कंपनियों को दिए जाने वाले प्लास्टिक में केवल 10 प्रतिशत मात्रा निजी फैक्टरियों की होती है, बाकी प्लास्टिक कचरा बीनने वालों का ही होता है।

 

 

सभार- डीबी स्टार

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