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अक्षय ऊर्जा विकेन्द्रीकरण ही भारत की ऊर्जा गरीबी का समाधान है : सुनीता नारायण

नई दिल्ली: भारत के लगभग 50 करोड़ लोगों के उपयोग के लिए हर दिन छह घंटे से कम हीं बिजली मिल पाती है। 70 करोड़ लोगों के लिए खाना पकाने के साफ ईंधन उपलब्ध नहीं है। ऐसे परिदृश्य में हमें समझने की जरुरत है कि कैसे देश भर में स्वच्छ ऊर्जा तक लोगों की पहुंच को आम बनाया जाए। विकेन्द्रीकृत अक्षय ऊर्जा प्रणाली ही इस परिस्थिति में ऊर्जा गरीबी की स्थिति को हल करने की कुंजी हो सकता है। सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने चौथे “अनिल अग्रवाल-ऊर्जा के उपयोग और नवीकरणीय” पर वार्ता में यह बात कही।

 दो दिवसीय वार्ता सत्र में नई और नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने सीएसई की नागरिक रिपोर्ट “अक्षय ऊर्जा के स्तर” को भी जारी किया। देश की अक्षय ऊर्जा की वर्तमान स्थिति के उपर जारी इस रिपोर्ट में सौर उर्जा, हवा, छोटे हाइड्रो,  बायोमास और अपशिष्ट करने वाली ऊर्जा क्षेत्रों में नीतिगत हस्तक्षेप का जायजा लिया गया है।

                           

वार्ता के दौरान योजना आयोग के सदस्य बी. के. चतुर्वेदी ने कहा कि भारत में समयपूर्व होने वाली मौतों का मुख्य कारण asphyxiation (श्र्वासावरोधन) है। उन्होने इस प्रदूषण की वजह जैव-मास का उपयोग कर खाना बनाना बताया। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की साल 2013 की रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक वर्ष 3.5 लाख महिलाओं और बच्चों के मौत का जिम्मेदार खाना पकाने मे गंदे ईंधन के उपयोग है।

वार्ता से यह बात भी सामने आयी कि 2012-13 में अक्षय उर्जा स्त्रोत से उत्पादित  बिजली द्वारा 60 करोड़ लोगों की बिजली की आवश्यकताओं को पूरा किया गया। लेकिन अभी भी भारत में अपार ऊर्जा गरीबी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, ओडिशा और झारखण्ड के 50 प्रतिशत घरों को अभी तक ग्रिड से जोड़ा जाना बाकी है। अगर हम अब तक पर्याप्त पर्यावरण सुरक्षा उपायों को लागू नहीं कर पाये है तो इस पारिस्थिति मे अक्षय ऊर्जा परियोजना हमारे लिए अहम है।

वार्ता मे बी. के चतुर्वेदी, सदस्य, योजना आयोग, सतीश बलराम अग्निहोत्री, सचिव, नई और नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रीय मंत्रालय; अजय शंकर, सदस्य सचिव, राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता परिषद; दीपक गुप्ता, निदेशक सामान्य, राष्ट्रीय सौर ऊर्जा फेडरेशन ऑफ इंडिया और जी. प्रधान, अध्यक्ष, केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग शामिल थे।

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