एनजीओ रॉयल एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसायटी की दायर याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि विषैला भोजन परोसने वालों पर रहम नहीं।

नई दिल्ली : तल्ख टिप्पणी करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति मनमोहन ने रॉयल एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसायटी की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। बच्चे देश का भविष्य होते हैं, उन्हें अच्छा व स्वस्थ भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी सरकार की होती है, और इसी उद्देश्य से मिड-डे मिल की योजना भी शुरू की गई है। सरकार ने मिड-डे मिल सप्लाई करने का ठेका विभिन्न संस्थाओं को दिया है। अगर कोई संस्था अपने कार्य में लापरवाही बरतते हुए बच्चों को जहरीला व घटिया भोजन परोसती है तो उसके प्रति किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती।

इस एनजीओ के द्वारा तैयार मिड-डे मिल में तीन बार छिपकलियां मिलने की वजह से उसका ठेका रद कर ब्लैक लिस्ट कर दिया गया था। एनजीओ ने दिल्ली सरकार द्वारा जारी उस आदेश को रद किए जाने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी। खंडपीठ ने सरकार का फैसला सही है ठहराते हुए कहा कि एक बार किसी भोजन में छिपकली मिलना इत्तेफाक हो सकता है, मगर बार-बार उसी संस्था के द्वारा तैयार मिड-डे मिल में छिपकली का मिलना दर्शाता है कि वे किस कदर लापरवाह हैं। इतना ही नहीं, संस्था के द्वारा तैयार भोजन खाकर 10 बच्चों की जान पर बन आई। बच्चों को विषैला भोजन देने के मामले में किसी भी प्रकार की नरमी की गुंजाइश नहीं है।

मामला क्या था ?

दिल्ली सरकार ने रॉयल एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसायटी को 29 सितंबर, 2009 में स्कूलों में मिड-डे मिल सप्लाई के लिए तीन वर्ष का ठेका दिया था। एनजीओ द्वारा 26 नवंबर, 2010 को सर्वोदय कन्या विद्यालय मंगोलपुरी में सप्लाई किए गए भोजन में मरी हुई छिपकली निकली थी। इसके बाद फिर से इसी एनजीओ के द्वारा तैयार मिड-डे मिल में 25 अगस्त, 2011 को सर्वोदय कन्या विद्यालय पूठकलां में एक मरी हुई छिपकली निकली। मिड-डे मिल खाने से 10 बच्चे बीमार हो गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। तीसरी बार फिर एनजीओ द्वारा 29 अगस्त, 2011 को रोहिणी सेक्टर-20 स्थित राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में बांटे जा रहे मिड-डे मिल से जिंदा छिपकली निकली। इस तरह की लापरवाही को देखते हुए सरकार ने जांच कमेटी गठित कर 4 जनवरी, 2013 को एनजीओ का ठेका रद कर उसे ब्लैक लिस्ट कर दिया था।

 

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