मिड-डे-मील में बच्चों की संख्या को लेकर घपलेबाजी का खेल।

कानपुर के सरकारी स्कूल कालेजों के बच्चों को मिड डे मील के आंकड़ों का खेल चौकाने वाला है। सवाल यह उठ रहा है कि बच्चों की संख्या घट रही है और मिड डे मील का खर्च तथा रसोइयों की संख्या बढ़ रही है। स्थिति यह है कि मिड डे मील के नियमित न मिलने की शिकायतें फिर भी मिलती हैं। शासन ने इसे गंभीरता से लिया है और जांच प्रक्रिया तेज कर दी है।

कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को दी जाने वाली मिड डे मील उपलब्ध कराने के जिम्मेवारी शहरी क्षेत्र में स्वयंसेवी संस्थाएं और ग्रामीण क्षेत्र में स्कूलों में प्रधान व प्रधानाध्यापकों की है। भोजन के लिए प्राथमिक व जूनियर के लिए प्रति छात्र की दर से खाद्यान्न मिलता है जिससे भोजन तैयार करने के लिए प्रति छात्र कन्वर्जन शुल्क मिलता है। घपलेबाजी तो बच्चों की संख्या को लेकर होती है। आंकड़ों को देखें तो जिन सालों में खाने वाले घटे, उस साल खर्च बढ़ा। भले ही बच्चों की संख्या घटी अथवा लगभग स्थिर रही हो परंतु रसोइयों की संख्या व खर्च में घटा बढ़ी जारी रही। नियुक्त रसोइयों के लिए अलग से ग्रांट जो आती है।

जिले में 2010-11 में 2.35 लाख बच्चों के भोजन के लिए 9.83 करोड़ रुपए की ग्रांट खर्च हुई तो 2011-12 में 2.31 लाख बच्चों के भोजन पर 11.69 करोड़ रुपए की ग्रांट खर्च हुई।

शासन ने अब भोजन पाने वाले बच्चों की सही उपस्थिति दर्ज करने का दबाव स्कूलों पर बनाया है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे हर माह ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम दो-दो व शहरी क्षेत्र में पांच पांच मध्यावकाश व बंद होते समय बच्चों की उपस्थिति की जांच करें ताकि इस तरह की घपलेबाजी पर रोक लग सके।

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