मेन्यू से मेडल नहीं मिलता साहब : विकास सिंह

“बोल्ट ने बीफ खाकर ओलंपिक में जीते गोल्ड मेडल ”,  देश राष्ट्रीय खेल दिवस मना रहा था और उसी मौके पर बीजेपी सांसद उदित राज का जमैका के धावक उसेन बोल्ट की उपलब्धी को लेकर किए गए इस ट्वीट से हंगामा तो मचना हीं था। कई मायनों को समेटे इस ट्वीट पर विवाद बढ़ता देख उदित राज अपने ट्वीट को भले हीं हटा लिया हो और इस ट्वीट के अलग-अलग मायने समझा रहें हों, जैसे कि खिलाड़ी सरकार को दोष न दें, बोल्ट शारीरिक रुप से कमजोर और गरीब था, उसके कोच ने उसको ये सलाह दी थी, आदी-आदी। लेकिन अपने बयान का जो मतलब वो समझा रहें उससे भी उनसे सवाल बनता है कि अगर सरकार की व्यव्स्था दोषी नहीं, तो क्या रिओ ओलंपिक में खराब प्रदर्शन के सिर्फ खिलाड़ी हीं दोषी हैं ? , क्या सरकार के द्वारा बनाई गई संस्थाओं और खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं में कमी का कोई दोष नहीं ?  खैर बहस के लिए अलग से ये मुद्दा है हीं, साथ में यह समझना है कि क्या खिलाड़ियों के बीफ खाने से ओलंपिक में गोल्ड मेडल की झरी लग जाएगी ? क्या भारतीय खिलाड़ी अपने धार्मिक भावनाओं और खान-पान संस्कृति को त्याग कर बीफ खाना शुरु कर दें ?  क्या किसी भी देश के नेता ने मेडल के खातिर अपने खिलाड़ियों को इस तरह के तरीके आजमाने की सलाह इससे पहले दी है ? 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उसेन वोल्ट ने कभी भी साक्षात्कार में स्वयं ये नहीं कहा है कि वो खाने में बीफ का सेवन करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार बोल्ट के डायट में 60 फीसदी प्रोटीन, 30 कार्बोहाईड्रेट्स फीसदी और 10 फीसदी वसा होता है, जिसकी पुर्ति के लिए वो मांसाहारी और शाकाहारी भोज्य पदार्थों का सेवन करते हैं और वो विटामिन सी के लिए मान्य सप्लिमेंट्स भी लेते हैं। उनके कथन की पुष्टि खेल और खिलाड़ियों के डायट को लेकर सुचना देने वाली दो विश्वप्रशिद्ध वेबसाइटों ने भी किया है। वेबसाइट के मुताबिक बोल्ट बीफ नहीं खाते हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक धावक कार्ल लुईस पहले मांसहारी थे बाद में शाकाहारी हुए और कई रेस में उन्होंने जीत हांसिल की । मुक्केबाज माइक टाइसन भी पहले मांसहारी थे बाद में शाकाहारी हुए और लगातार 10 फाइटों में जीत उनको हीं मिली,  मशहूर लॉन टेनिस खिलाड़ी विलियम्स बहनें में एक वीनस विलियम्स भी बाद में शाकाहारी हुईं और दो बार विम्बलंडन के कप पर कब्जा जमाया। इन महानतम खिलाड़ियों की सफलता को देखकर ऐसा तो नहीं लगता खेल में उनके प्रदर्शन पर मांसहारी से शाकाहारी होने का कोई खास असर पड़ा हो।

शोध तो ये कहता है कि बीफ से ज्यादा प्रोटीन की मात्रा चिकन में पाई जाती है, चिकन से भी ज्यादा मात्रा तो सोयाबीन में है। 100 ग्राम सोयाबीन में 36 ग्राम प्रोटीन की मात्रा होती है जबकि एक खिलाड़ी को औसतन 65 ग्राम प्रोटीन रोजाना चाहिए। और ये खिलाड़ी पर निर्भर करता है कि वो किस रुप में इस जरुरी न्यूट्रीएंट की पुर्ति करता है। हाल हीं में ओ पी जैशा के मामले में खिलाड़ी ने भारतीय खेल प्राधिकरण के अधिकारियों पर आरोप लगाया की मेराथन स्पर्धा के दौरान विशेष रिफ्रेशमेंट या ड्रिंक उपलब्ध नहीं कराया गया जिसके कारण उसकी जान जाते-जाते बची, और सरकार द्वारा इस मामले की जांच कराई जा रही है। ऐसे में जहां खिलाड़ीयों को विशेष रिफ्रेशमेंट या ड्रिंक तक उपलब्ध कराने की जांच हो रही हो, वहीं उदीत राज का बयान की बीफ खाकर मेडल जीता सकता है, हास्यापद हीं है।


हॉकी के जादूगर ध्यानचंद, उड़नपरी पी.टी. उषा, निशानेबाज ओलंपियन अभिनव बिन्द्रा, बैडमिंटन खिलाड़ी सायना नेहवाल और पी. बी. सिंघु ने तो विशेषज्ञों द्वारा सुझाये गए डायट या संतुलित देसी परंपरागत भोजन खाकर हीं सफलता के किर्तिमान को रचा है। और तो और विश्व चैंपियन बने भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों ने भी जो सफलता पायी है उसके लिए उन्हें कभी भी बीफ खाने की जरुरत नहीं पड़ी । तो फिर खेल और खिलाड़ियों को लेकर तरह तरह के विरोधाभासी बयान देकर क्या हांसिल करना चाहते हैं सेलिब्रिटी और नेतागण ?

जब देश में गाय और बीफ को लेकर समाज दो ध्रुवों में बटने को आतुर हो, बीफ के नाम पर दंगा-फसाद और हत्या तक हो गए हों, देश सहिष्णुता और असहिष्णुता को भंवर में गोते लगा रहा हो, पार्टियों द्वारा अघोषित रुप से इसे मद्दा बना कर चुनावी जंग लड़े गए हों, ऐसे में ये कहना कि बोल्ट जैसा खिलाड़ी बीफ खाकर मेडल जीता, यह बयान मेडल जितने से ज्यादा राजनीतिक दांव हीं कहलाएगा। बीफ को लेकर माहोल बिगाड़ने वालों को उदित राज ने जाने-आनजाने में एक मुद्दा तो दे हीं दिया है। इसका राजनीतिक मतलब तब और ज्यादा हो जाता जब उदित राज के गाय और दलित मसले को लेकर धर्म परिवर्तन वाला बयान हाल हीं में आया था। कुल मिलाकर सियासी मतलब तो निकलना लाजमी हीं है।

उदित राज जैसे वरिष्ठ नेताओं की सोच दर्शाता है कि हमारे नेता खेल औऱ खिलाड़ियों की उपलब्धी को लेकर कितने गंभीर है। खेल से राजनीतिक लाभ लेने की मनसा से कब मुक्त होंगे राजनीतिज्ञ। पदक तालिक में नीचे रहने के समुचित कारण ढूंढ़ने के वजाय उसे ऐसे मसले से जोड़ देना जिसके कारण देश में राजनीति की हवाएं गर्म हो जाती हों, उससे भला खेल और खिलाड़ी को क्या लाभ ? 

न केवल खेल की दुनियां के मशहूर खिलाड़ी शाकाहारी हैं, बल्कि इससे इतर फिल्म और राजनीति के कई दिग्गज भी शाकाहारी हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी भी शाकाहारी हैं । उनकी उर्जा और लगातार बिना थके काम करने की क्षमता का तो पक्ष –विपक्ष दोनो हीं सराहना करते हैं। 

खिलाड़ियों को जो डायट दिया जाता है वो विशेषज्ञ की देख-रेख में दिया जाता है। इसका खास ध्यान रखा जाता है कि कोई भी खिलाड़ी अनजाने में किसी ऐसे भोज्य पदार्थ का सेवन न कर ले जिससे प्रतिंबंधित रासायन उनके शरीर चला जाय, और वो डोप टेस्ट में पॉजिटीव पाया जाय। हाल हीं में इसका खामियाजा एक खिलाड़ी को भुगतना पड़ा। कोई भी बयान देने से पहले कम से कम उस संदर्भ में थोड़ा हीं सहीं लेकिन कोई रिसर्च या अन्य जानाकारी जरुर इक्कठा कर लेनी चाहिए, ताकि बयान का कोई गलत संदेश खेल या खिलाड़ी को न जाय। बयान देने वालों को ये भी नहीं भूलना चाहिए कि उनके बयान के राजनीतिक और सामाजिक मायने भी होते हैं। उनके विवादास्पद बयानों से खेल और खिलाड़ियों का भला नही होता बल्कि खेल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने के वजाय मुद्दा भटककर राजनीतिक संदर्भ ले लेता है।

कई रिसर्च बताते हैं कि प्रशिक्षण और स्पेशियवाईज्ड डायट के दम पर खिलाड़ीयों ने किर्तीमान तोड़े और बनाए हैं। संतुलित डायट के साथ प्रशिक्षण, अंतराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं, खिलाड़ीयों की लगन और मेहनत, एक्सपोजर और तकनीक के साथ-साथ शारीरिक और मानसिक मजबूती का तालमेल खिलाड़ी की सफलता में अहम योगदान देता है।

देश 117 सदसीय खिलाड़ियों के दल के द्वारा अपेक्षाकृत कम मेडल हांसिल करने के कारण चिंता और चिंतन की दोड़ से गुजर रहा है, स्वयं प्रधानमत्रीं ने भी अगले तीन ओलंपिक के तैयारी के लिए टास्क फोर्स के गठन का एलान किया और बेहतर उपलब्घि पाने के संकल्प लिए देश मिशन मोड में है। ऐसे में एक खिलाड़ी के कोच को उदृत करते हुए उदित राज का बीफ खाकर उपलब्धी पाने का मॉडल देश के सामने रखना तार्किक नहीं हैं। इससे खिलड़ियों की भावना तो आहत होंगी हीं साथ हीं खेल को अपना करियर बनाने को सोच रहे युवा और बच्चों को भी हतोउत्साहीत कर सकता है।

होना तो ये चाहिए कि रियो ओलंपिक के परिणाम से सीख लेते हुए, अपनी कमियों को सुधारकर, 2020 के ओलंपिक में पदक तालिका में और बेहतर स्थान पाने के लिए सार्थक बहस हो और जरुरी बदलाव किया जाए।  देश भर में खेल के बारे में जानकारी और जागरुकता करने पर जोर दिया जाए। ताकि बेहतर खेल संस्कृती का निर्माण किया जा सके। खेल में करियर बनाने वाले बच्चों और उनके अभिभावकों को शुरु से हीं यह जानकारी उपलब्ध हो कि किस खेल में भविष्य बनाने के लिए क्या क्या करने की जरुरत है। किस तरह का प्रशिक्षण लिया जाता है, और ये प्रशिक्षण कहां उपलब्ध है। इन सब बातों की ठीक-ठीक जानकारी हर भारतीय को ठीक उसी तरह से हो जिस तरह क्रिकेट बारे में गली, नुक्कड़, चौराहे और सड़क पर चर्चा करने वाले बच्चे-बुढ़े सबको है।

भविष्य के खिल़ाडियों तैयार करने में और अंतराष्ट्रीय पटल पर देश का मान-सम्मान बढ़ाने के लिए खेल संस्थाओं के साथ-साथ स्कूल, अध्यापक, अभिभावक और मीडिया को अहम भूमिका निभानी पड़ेगी। आधी-अधूरी सुचनाएं और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर बयान देने वालों को भी सोचना चाहिए की इससे खेल और खिलाड़ी का भला नहीं होने वाला।  

(बिकास सिंह)
 

 

 

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