किसान चैलन से उम्मीदें - अवधेश कुमार

आज दूरदर्शन के किसान चैनल की शुरुआत कार्यक्रम में उपस्थित रहा है। वैसे विज्ञानभवन में खासकर जब प्रधानमंत्री के इस तरह के कार्यक्रम हो जहां भीड़ बढ़ने की संभावना हो, मैं जाने से बचता हूं। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम इसलिए था, क्योंकि हमारे देश में जितने आर्थिक चैनल है वो शेयर बाजार, प्रोपर्टी बाजार, मोटर बाजार, या उद्योगों आदि के व्यापार तक सीमित हैं, और देश के 60 प्रतिशत लोगों की उसमें कोई चर्चा ही नहीं। किसान चैनल उसकी भरपाई करने के उद्देश्य से लाया गया है। 

यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सपना था जो सरकार के एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर आरंभ हुआ। इसमें देश के सभी क्षेत्रों से किसान प्रतिनिधियों को बुलाया गया था। कृषि वैज्ञानिक एवं इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी थे। अन्य लोग भी थे। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो भाषण दिया उसे पूरे देश ने सुना। मैं कई बार मोदी की सोच में ऐसी कमी तलाशता हूूं या हाव भाव से इरादे में दोष ढूंढने की कोशिश करता हूं, जिससे आलोचना करता हूं, पर हार जाता हैं। ऐसा नहीं कि मैं उनकी सब बातों से सहमत हो जाउं। पर हर विषय पर व्यावहारिकता की दृष्टि से इतना विचार कर चुका नेता मुझे कोई मिला नहीं। किसानों की बात थी तो आज उनने जिस तरह खेती की समस्याओं और उनके समाधान का जिक्र किया उससे लगता है कितनी दूर तक मोदी ने सोचा है। एक संकल्प भी था कि किसानी को उत्तम कार्य फिर से बनाना है ताकि तेज तर्रार, खूब पढ़े लिखे लोग भी खेती की ओर मुड़े और यह लाभकारी तथा सम्मान का कार्य बन जाए। 
जैसा वो चाहते हैं अगर किसान चैनल उसी तरह की भूमिका निभाए तो निश्चय ही किसानों के लिए बहुत बड़ी बात होगी। किसानों के मानस परिवर्तन, उनको किस समय क्या खेती करना, कैसा करना, किस तरह सिंचाई करना, उर्वरक डालना, सूखा है तो क्या करना, पैदावार को कहां बेचना, आधुनिक तकनीक का कैसे प्रयोग करना....आदि पर तो रास्ता दिखा ही सकता है, उनकी समस्या क्या है इसके सुनने का मंच भी हो सकता है। आजादी के 60 वर्षों से खेती का जो संकट बढ़ा है उसमें इसका ऐतिहासिक और युगांतकारी योगदान हो सकता है। 

किंतु किसान चैनल की उनकी जो कल्पना है क्या वही कल्पना उसके संचालकों की है? नरेश सिरोही किसान नेता रहे हैं। उनकी सोच कुछ है। वे चाहेंगे। लेकिन दूरदर्शन पर चारों ओर सूचना सेवा के अधिकारियों का बोलबाला है। बगैर उनकी अनुमति के कुछ हो ही नहीं सकता। डीडी न्यूज उनके चंगुल से निकल नहीं पा रहा है। किसान चैनल उससे निकल जाएगा यह कल्पना करना आसान नहीं है। बहुत सारे पत्रकार तो उसमें नौकरी करने आए हैं उनके अंदर मोदी की कल्पना डालने और उन्हें उसके अनुसार काम करने को प्रेरित करने की भूमिका कौन निभाएगा? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर प्रधानमंत्री को ही तलाशना होगा। प्रसार भारती की सीमायें इन कुछ महीनों में काफी स्पष्ट हुईं हैं। 
मोदी को अपने सपने को सफल बनाने के लिए स्वयं इसमें अभिरुचि लेनी होगी।

      (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं , उनका वेबपोर्टल है www.awadheshkumar.com )

 

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