नक्सल समस्या : चुनौती और राहें !- उदय कुमार

झारखण्ड पूरे भारत में नक्सल प्रभावित राज्यों की सूची में ऊपर से दूसरे नंबर पर आता है। लाल गलियारा ( रेडकॉरिडोर ) तक़रीबन पूरे राज्य से उत्तर से दक्षिण होकर गुजरता है ।लेकिन नक्सल समस्या अगर राज्य के लिए एक चुनौती है तो इसके समाधान की राहें भी बहुत है ।  एक विश्लेषण  

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नक्सल समस्या के व्याख्या कर्ता भी इस समस्या का कोई सरल और सामान्य हल ढूँढ पाने में अक्षम हैं । केवल  राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच भी इस समस्या का समाधान नहीं है ।परन्तु जन सामान्य हेतु इन योजनाओं का सरकार तक पहुंचना इसलिए भी ज़रूरी है ताकि जन साधारण को कोई दिक्कत नहीं हो । सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद नक्सली आक्रामक बने हुए हैं।

   

आये दिन झारखण्ड नक्सलियों का प्रयोगशाला बनता जा रहा है । चाहे इंस्पेक्टर फ्रांसिस इन्दीवर की निर्मम हत्या हो या पाकुड़ के पुलिस अधीक्षक की अम्बुश में हत्या ।सबसे चौंकाने वाला तथ्य तब सामने आया जब नक्सलियों ने सीआर पी एफकांस्टेबल बाबूलाल पटेल के मृत शरीर में आई डी लगा दिया ताकि अगर कोई मृत शरीर को उठाये तो आईडी धमाके से और भी मौत हो जाए। झारखण्ड में  ऐसाक्योंहो रहा है ? क्या नक्सली लम्बी रणनीति के तहत इसका प्रयोग कर रहे हैं या नक्सली आगे की योजनाओं को अंजाम देने के लिए अभी रिहर्सल कर रहे हैं ।ऐसी कई घटनायें घट रही है जिसे नक्सली पहली बार झारखण्ड में अंजाम देते हैं बाद में दूसरे राज्यों में इसी तरह की घटनायें दोहराई जाती है । महिला नक्सली की भागीदारी तथा पुरुष नक्सल के साथ सहायक के तौर पर उनका उपयोग और बाद में योन शोषण झारखण्ड के नक्सलियों में आम  बात अब हो चुकी है ।

आमतौर पर ऐसी धारणा है कि नक्सल प्रभावित जिलों में कोई भी उपाय कारगर नहीं होता है और वहां पर सरकारी मशीनरी पूरी तरह से धराशायी हो चुकी है। कोई यह कह सकता है कि इन जिलों में राशन की दुकान तक नहीं है जहां पर हर दिन की जिंदगी अपने आप में किसी संघर्ष से कम नहीं। जहां निर्दोष ग्रामीणों को नक्सलियों और सशस्त्र बलों के संघर्ष में अपनी जान गंवानी पड़ती है। सारंडा के जंगलों में सरकार के द्वारा सारंडा एक्शन प्लान का क्रियान्वयन एक अहम फैसला था । कुछ हद तक सारंडाएक्शनप्लान से जनता का विश्वास सरकारी तंत्र में लौटने लगा था ।

क्या विनिंग  ऑफ़हर्ट्स एंड माइंड ( दिलो और दिमाग को जितना) रणनीति झारखण्ड राज्य के लिए कारगर है । आम जनता को मुख्य धारा में लाना एक अहम चुनौती है । जनता की भागीदारी ग्राम्य स्तर पर नक्सलियों को हाशिये पर धकेल सकता है ।  राज्य सरकार अगर चाहे तो केंद्र सरकार की मदद से औक्जिलियरी ट्राइबल आर्मी (सहायक जनजातीय सेना)  बनाकर राज्य की युवा जन जातीय आबादी को नक्सलियों से दूर रख सकती है । आखिर जनजातीय आबादी ही नक्सल के लिए नए भर्ती का मुख्य लक्ष्य होता है ।भूत काल में जीतने भी कदम राज्य सरकार के द्वारा उठाये गए वह अब तक नाकाफी साबित हुआ है । दूर-दराज के जंगलों में सरकारी तंत्र की उपस्थिति जताना सरकार के लिए एक अहम चुनौती साबित हो रहा है ।इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार को  स्थानीय जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा ।

झारखण्ड नक्सल समस्या के कई आयाम हैं ।अगर उन सभी आयामों का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाये तो कई रास्ते  इस समस्या के समाधान के खुल सकते हैं । इन समस्याओं से निपटने के लिए एक दृढ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति की हमेशा आवश्यकता होती है । आखिर यह जनतंत्र है और गोली-बन्दूक इस समस्या का कभी हल नहीं हो सकता है !

उदय कुमार,केन्द्रीय सुरक्षा  बल में डिप्टी कमांडेंट हैं तथा आंतरिक सुरक्षाव नक्सल मामलों के विशेषज्ञ हैं ।

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Key words: naxalism, naxal

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