मेन्यू से मेडल नहीं मिलता साहब : विकास सिंह

“बोल्ट ने बीफ खाकर ओलंपिक में जीते गोल्ड मेडल ”,  देश राष्ट्रीय खेल दिवस मना रहा था और उसी मौके पर बीजेपी सांसद उदित राज का जमैका के धावक उसेन बोल्ट की उपलब्धी को लेकर किए गए इस ट्वीट से हंगामा तो मचना हीं था। कई मायनों को समेटे इस ट्वीट पर विवाद बढ़ता देख उदित राज अपने ट्वीट को भले हीं हटा लिया हो और इस ट्वीट के अलग-अलग मायने समझा रहें हों, जैसे कि खिलाड़ी सरकार को दोष न दें, बोल्ट शारीरिक रुप से कमजोर और गरीब था, उसके कोच ने उसको ये सलाह दी थी, आदी-आदी। लेकिन अपने बयान का जो मतलब वो समझा रहें उससे भी उनसे सवाल बनता है कि अगर सरकार की व्यव्स्था दोषी नहीं, तो क्या रिओ ओलंपिक में खराब प्रदर्शन के सिर्फ खिलाड़ी हीं दोषी हैं ? , क्या सरकार के द्वारा बनाई गई संस्थाओं और खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं में कमी का कोई दोष नहीं ?  खैर बहस के लिए अलग से ये मुद्दा है हीं, साथ में यह समझना है कि क्या खिलाड़ियों के बीफ खाने से ओलंपिक में गोल्ड मेडल की झरी लग जाएगी ? क्या भारतीय खिलाड़ी अपने धार्मिक भावनाओं और खान-पान संस्कृति को त्याग कर बीफ खाना शुरु कर दें ?  क्या किसी भी देश के नेता ने मेडल के खातिर अपने खिलाड़ियों को इस तरह के तरीके आजमाने की सलाह इससे पहले दी है ? 

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किराये की कोख, ममत्व या करोबार - विकास सिंह

 पहली बार भारत में सरोगेसी के लिए तब बहस शुरु हुआ जब 2004 में पता चला कि एक 47 साल की महिला ने अपनी बेटी के लिए अपनी कोख दी। गुजरात की रहने वाली उस नानी ने तब अपनी कोख से दो जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था। तभी से सामाजवेज्ञानिकों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। बाद में इससे समाज पर पड़ने वाले प्रभाव, महिलाओं के शारिरिक शोषण, बच्चों की नागरिता के साथ-साथ मानवाधिकार हनन संबंधी कई मसलों पर देश भर में चर्चा होती रही। माननीय उच्चत्म न्यायालय तक ने भी सरकार को इससे उत्तपन्न हो रही समस्याओं पर ध्यान देने को कहा ।

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किसान चैलन से उम्मीदें - अवधेश कुमार

आज दूरदर्शन के किसान चैनल की शुरुआत कार्यक्रम में उपस्थित रहा है। वैसे विज्ञानभवन में खासकर जब प्रधानमंत्री के इस तरह के कार्यक्रम हो जहां भीड़ बढ़ने की संभावना हो, मैं जाने से बचता हूं। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम इसलिए था, क्योंकि हमारे देश में जितने आर्थिक चैनल है वो शेयर बाजार, प्रोपर्टी बाजार, मोटर बाजार, या उद्योगों आदि के व्यापार तक सीमित हैं, और देश के 60 प्रतिशत लोगों की उसमें कोई चर्चा ही नहीं। किसान चैनल उसकी भरपाई करने के उद्देश्य से लाया गया है। 

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क्या यह एक बीमार होते समाज की आहट है ? - प्रो. मनोज कुमार झा

बीते कुछ वर्षों और खास तौर पर पिछले दिनों से यह अहसास तारी होता जा रहा है कि हमारा देश और हमारा परिवेश कुछ ज्यादा ही द्रुत गति से बदल रहा है. कई बार इस तेज गति की वजह से बदलाव की दिशा और उसकी मूल गुणवत्ता पर चर्चा नहीं के बराबर होती है. मैं आप लोगों से सिर्फ हाल की एक घटना पर अपना विचार साझा करना चाहता हूँ. आप लोगों ने सुना होगा कि ‘ग्रीन पीस’ नामक ‘एनजीओ’(स्वयंसेवी संस्था) को तथाकथित ‘देश विरोधी हरकतों’ के आधार पर कार्य करने से मना कर दिया गया. उनकी फंडिंग इत्यादि को पहले ही रोक दिया गया था. कुछ छिटपुट असहमति के स्वर आये लेकिन लेकिन ‘देशहित में दृढ निर्णय लेने में सक्षम प्रधानमंत्रीजी ’ के आगे सारी असहमति बेमानी साबित हुई. फिर दस दिन पहले एक खबर आयी कि तकरीबन नौ हज़ार और स्वयंसेवी संस्थाओं को ‘कार्य निषेधित’ कर दिया गया है. कारण कमोबेश वही दिए गए जो ग्रीन पीस के लिए गिनाये गए थे...... और सबसे बड़ा कारण था कि ये सारी संस्थाएं राष्ट्र की छवि ख़राब कर रही हैं. 

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नक्सल समस्या : चुनौती और राहें !- उदय कुमार

झारखण्ड पूरे भारत में नक्सल प्रभावित राज्यों की सूची में ऊपर से दूसरे नंबर पर आता है। लाल गलियारा ( रेडकॉरिडोर ) तक़रीबन पूरे राज्य से उत्तर से दक्षिण होकर गुजरता है ।लेकिन नक्सल समस्या अगर राज्य के लिए एक चुनौती है तो इसके समाधान की राहें भी बहुत है ।  एक विश्लेषण  

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विकास किया है, तो फिर जनता मैं इतना आक्रोश क्यों हैं ? – सुल्तान अहमद

शहर की खूबसूरत ऊँची-ऊँची चमकती इमारतें, लम्बे-चौड़े प्लाई-ओवर, चार लेन वाली सड़कें और उस पर दन दनाती गाड़ियों का कारवां को देखकर तो ऐसा लगता है जैसे वाकई इस भारत मैं अब कोई गरीब नहीं रहा। लेकिन जब आये दिन खबरें मिलती है कि बिहार, झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों में गरीबी के कारण लोग अपने कलेजे के टुकड़े को बेच कर दो जून की रोटी का इन्तजाम करने को तैयार हैं।

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सन्नाटा क्यों पसरा है वामपंथी खेमे में

- आलोक कुमार

2014 को फतह करने की जोर आजमाईश है। चुनावी चिल्ल-पौं मचा है। सबसे बड़े लोकतंत्र का उल्लास पर्व मनाया जा रहा है। नहले पर दहले का दांव ताबड़तोड़ चला जा रहा है। तमाशा सजा है। राजनेता जमूरा बने हैं। शोर मचा मचाकर वोटर को लुभाने, खिंचने और रिझाने का मजेदार चक्कर चल रहा है। सच्चा- झूठा साबित करने की प्रतिद्वंदिता छिड़ी है। इस शोरगुल में एक आवाज फीकी पड़ी है। यह फीकी आवाज है, वामपंथी दलों की। गरीब मजदूरों के हित के लिए उठने वाली वैचारिक आवाज को लेकर काम्युनिस्ट नेता मैदान से गायब हैं।

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बिक रहीं हैं बेटियां बाजार में, मौन क्यों हैं हम ?

- बिकास सिंह

 - बिकास सिंह

 महज 15 साल की उम्र पूरी करने से पहले हीं छत्तीसगढ़ के सितौंगा गांव की एक युवती को पांच बार बेचा गया। उसे छोटे से अंधेरे कमरे में रखा गया, यातना और बलात्कार उसकी नियती बन गई। एक नबालिग लड़की की यह दुर्दशा बयां करती है कि हिन्दुस्तान की बेटियां किस कदर मानव तस्करी के मकड़जाल में उलझकर यातनाओं और दैहिक शोषण की शिकार हो रहीं हैं।

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बिहार के विकास मॉडल की ललाट पर गुरबत की लकीरें

  - बिकास सिंह

विपरीत परिस्थिति में जी रहे बिहार के दियरा के लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. विकास की बाट जोहते तो पीढियां गुजर गईं, लेकिन हिस्से आई सिर्फ गुरबत की जिन्दगी और बाढ़ का कहर। नतीजा ये है कि अब जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के नाम पर नक्सली दियरा जल क्षेत्र में पैर जमाने के लिए पूरी ताकत से जुट गए हैं

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सरोकार बढाने के लिए जरूरी है परिवारिक खेती

 

 


डॉ. चद्रपॉल सिंह यादव

संयुक्त राष्ट्र संघ ने मौजूदा वर्ष को परिवारिक खेती के लिए समर्पित किया है। हम कृषि प्रधान देश से हैं। पश्चिम और अपने यहां खेतिहर परिवार की अवधारणा में मौलिक अंतर है। अपने यहां सफल खेतिहर परिवार एकल नहीं है। इसलिए अपने यहां परिवारिक खेती मतलब एकल परिवार के लोगों को विस्तृत परिवार की जरूरत का ख्याल कराने और दैनिक मजदूरी भत्ता का बचत कर लेने तक सीमित नहीं है। अपने यहां परिवारिक खेती का मतलब आंगन,समाज, गांव एवं परिवेश से सरोकार का मसला है। परिवारिक खेती के प्रोत्साहन को हम समाज की जरूरतों को केंद्र में रखकर की जाने वाली खेती का रूप दे सकते है। आंगन और समाज में सबके लिए सोचना और करना सहकारी चिंतन का आधार है। इसमें एकल परिवार के बजाय समाज को समाहित करने की बात होनी चाहिए। परिवार ही नहीं गांव के परिवारों के बीच संयुक्त उद्यमिता के तहत खेती की जाए।

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