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विकास की मिसाल (Change Makers)

transgenders

NCBC’s recommendation came after a Supreme Court judgment, which directed the Central and state governments to treat them as socially and educationally backward classes. The Ministry of Social Justice and Empowerment initiated the process by holding a national consultation. The consultation included all stakeholders like the state governments and discussed the modalities of including transgender persons under the OBC quota. 

Though the exact number of transgender persons in the country is not available, electoral roll data of the EC states that a total number of 23,019 people have registered themselves in the others category. As per a draft bill prepared by the Ministry, a transgender would be given an option to identify as a man, woman or transgender.
They should also have the right to choose options available, independent of surgery and hormones therapy. The bill states that only the nomenclature of ‘transgender’ should be used and terms like ‘other’ or ‘others’ should not be used. It also says that transgender persons would be issued a proper certificate for their identity by a state-level authority duly designated or constituted by the respective state or Union Territories.

 

Courtesy: The New Iindian Express

Transgenders may soon find themselves in the Other Backward Class (OBC) category

कॉपरेटिव सोसायटी

  • “भारत मॉडल का विकास आवश्यक“ जिसमें सहकारिताओं की भूमिका अहम -सुरेश प्रभु
  • सहकारिता सम्मेलन पांच सितारा होटल में न हो : राधामोहन सिंह
  • सहकारिता के रास्ते पर सरकार के लौट आने के संकेत
  • 60 गैर सरकारी सदस्यों को शासकीय सहकारी संस्था से बाहर का रास्ता दिखाया गया
  • सहकारिता दुनिया को आर्थिक मंदी से निकाल सकती है: चार्ल्स गोल्ड
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आलेख

  • कानून बनाने के पीछे मूल उद्देश तो यह होता है कि अपराध रुके, सबको न्याय मिले, समता मूलक समाज की स्थापना हो, लेकिन जब उसी कानून का दुरुपयोग होने लगे तो व्यक्ति और समाज कुंठाग्रस्त और आक्रोशित होने लगता है। ऐसे में, खासकर उन कानूनों को लेकर जिसका पूरे समाज पर असर होता हो, सरकार को संवेदनशीलता के साथ तार्किक निर्णय लेना चाहिए ।

  • “बोल्ट ने बीफ खाकर ओलंपिक में जीते गोल्ड मेडल ”,  देश राष्ट्रीय खेल दिवस मना रहा था और उसी मौके पर बीजेपी सांसद उदित राज का जमैका के धावक उसेन बोल्ट की उपलब्धी को लेकर किए गए इस ट्वीट से हंगामा तो मचना हीं था। कई मायनों को समेटे इस ट्वीट पर विवाद बढ़ता देख उदित राज अपने ट्वीट को भले हीं हटा लिया हो और इस ट्वीट के अलग-अलग मायने समझा रहें हों, जैसे कि खिलाड़ी सरकार को दोष न दें, बोल्ट शारीरिक रुप से कमजोर और गरीब था, उसके कोच ने उसको ये सलाह दी थी, आदी-आदी। लेकिन अपने बयान का जो मतलब वो समझा रहें उससे भी उनसे सवाल बनता है कि अगर सरकार की व्यव्स्था दोषी नहीं, तो क्या रिओ ओलंपिक में खराब प्रदर्शन के सिर्फ खिलाड़ी हीं दोषी हैं ? , क्या सरकार के द्वारा बनाई गई संस्थाओं और खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं में कमी का कोई दोष नहीं ?  खैर बहस के लिए अलग से ये मुद्दा है हीं, साथ में यह समझना है कि क्या खिलाड़ियों के बीफ खाने से ओलंपिक में गोल्ड मेडल की झरी लग जाएगी ? क्या भारतीय खिलाड़ी अपने धार्मिक भावनाओं और खान-पान संस्कृति को त्याग कर बीफ खाना शुरु कर दें ?  क्या किसी भी देश के नेता ने मेडल के खातिर अपने खिलाड़ियों को इस तरह के तरीके आजमाने की सलाह इससे पहले दी है ? 

  •  पहली बार भारत में सरोगेसी के लिए तब बहस शुरु हुआ जब 2004 में पता चला कि एक 47 साल की महिला ने अपनी बेटी के लिए अपनी कोख दी। गुजरात की रहने वाली उस नानी ने तब अपनी कोख से दो जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था। तभी से सामाजवेज्ञानिकों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। बाद में इससे समाज पर पड़ने वाले प्रभाव, महिलाओं के शारिरिक शोषण, बच्चों की नागरिता के साथ-साथ मानवाधिकार हनन संबंधी कई मसलों पर देश भर में चर्चा होती रही। माननीय उच्चत्म न्यायालय तक ने भी सरकार को इससे उत्तपन्न हो रही समस्याओं पर ध्यान देने को कहा ।

  • आज दूरदर्शन के किसान चैनल की शुरुआत कार्यक्रम में उपस्थित रहा है। वैसे विज्ञानभवन में खासकर जब प्रधानमंत्री के इस तरह के कार्यक्रम हो जहां भीड़ बढ़ने की संभावना हो, मैं जाने से बचता हूं। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम इसलिए था, क्योंकि हमारे देश में जितने आर्थिक चैनल है वो शेयर बाजार, प्रोपर्टी बाजार, मोटर बाजार, या उद्योगों आदि के व्यापार तक सीमित हैं, और देश के 60 प्रतिशत लोगों की उसमें कोई चर्चा ही नहीं। किसान चैनल उसकी भरपाई करने के उद्देश्य से लाया गया है। 

  • बीते कुछ वर्षों और खास तौर पर पिछले दिनों से यह अहसास तारी होता जा रहा है कि हमारा देश और हमारा परिवेश कुछ ज्यादा ही द्रुत गति से बदल रहा है. कई बार इस तेज गति की वजह से बदलाव की दिशा और उसकी मूल गुणवत्ता पर चर्चा नहीं के बराबर होती है. मैं आप लोगों से सिर्फ हाल की एक घटना पर अपना विचार साझा करना चाहता हूँ. आप लोगों ने सुना होगा कि ‘ग्रीन पीस’ नामक ‘एनजीओ’(स्वयंसेवी संस्था) को तथाकथित ‘देश विरोधी हरकतों’ के आधार पर कार्य करने से मना कर दिया गया. उनकी फंडिंग इत्यादि को पहले ही रोक दिया गया था. कुछ छिटपुट असहमति के स्वर आये लेकिन लेकिन ‘देशहित में दृढ निर्णय लेने में सक्षम प्रधानमंत्रीजी ’ के आगे सारी असहमति बेमानी साबित हुई. फिर दस दिन पहले एक खबर आयी कि तकरीबन नौ हज़ार और स्वयंसेवी संस्थाओं को ‘कार्य निषेधित’ कर दिया गया है. कारण कमोबेश वही दिए गए जो ग्रीन पीस के लिए गिनाये गए थे...... और सबसे बड़ा कारण था कि ये सारी संस्थाएं राष्ट्र की छवि ख़राब कर रही हैं. 

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