आईबी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जिन एनजीओ को विदेशों से पैसा मिलता है, उनमें से कई देश की आर्थिक तरक्की में बाधा उत्पन्न करते हैं।

खुफिया एजेंसी आईबी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें बताया गया है कि पीएम मोदी के सपनों को पूरा होने के बीच कौन-कौन रोड़ा बन सकते हैं। साथ ही साथ आईबी ने इस महीने के प्रारंभ में अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जिन एनजीओ को विदेशों से पैसा मिलता है, वे देश की आर्थिक तरक्की में बाधा उत्पन्न करते हैं।

क्या है रिपोर्ट में?
इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार, कुछ ऎसे एनजीओ हैं, जो लोगों से जुडे कुछ मसलों को उठाकर ऎसा माहौल बना देते हैं कि उससे विकास परियोजनाएं लटक जाती हैं या फिर विलंब हो जाती हैं।

इन एनजीओ को अमरीका, ब्रिटेन, नीदरलैंड, जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन और नार्वे जैसे देशों से आर्थिक मदद मिलती है। आईबी ने तीन जून को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उनका नकारात्मक प्रभाव इतना होता है कि जीडीपी विकास दर 2 से 3 फीसदी कम हो जाता है।

रिपोर्ट में ऎसे सात परियोजनाओं का जिक्र किया गया है, जो इनके कारण अटक गई हैं। इन एनजीओ के विरोध प्रदर्शन के कारण परमाणु ऊर्जा संयंत्र, यूरेनियम खदाने, कोयला ऊर्जा संयंत्र, बायोटेक्नॉलजी फार्म, बडे औद्योगिक परियोजनाएं, जल विद्युत संयंत्र और अन्य इंडस्ट्रीज ठप पडे हैं।

इस रिपोर्ट में इन एनजीओ के 2011-13 के विरोध-प्रदर्शनों का लेखाजोखा है, जिससे विकास कार्य प्रभावित हुए हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि 2014 मेे उनकी क्या गतिविधियां होंगी।

बताया गया है कि ये एनजीओ इंडोनेशिया से पाम ऑयल के आयात, भारतीय आईटी कंपनियों के ईलेक्ट्रॉनिक कचरे के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। साथ ही शहरी क्षेत्रों के कामगार मजदूरों को संगठित कर रहे हैं, गुजरात के विशेष निवेश क्षेत्र, पार तापी नर्मदा नदी जोड़ो परियोजना और दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का विरोध कर रहे हैं।

इन एनजीओ को मानवाधिकार के संरक्षण, महिलाओं के खिलाफ हिेसा को रोकने, जातिगत भेदभाव के विरोध, धार्मिक स्वतंत्रा के नाम पर अभियान चलाने के लिए विदेशों से आर्थिक मदद मिलती है।

आर्थिक मदद देने वाले विदेशी स्थानीय एनजीओ का नेतृत्व कर फिल्ड रिपोर्ट देश के खिलाफ तैयार करते हैं और फिर पश्चिमी देशों की सरकारें रणनीतिक विदेशी नीति बनाने में इसे एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करती हैं।

ये एनजीओ एजेंडा बनाने, दस्तावेजों को बनवाने, मीडिया में लेखन और सरकार-राजनयिकों की लॉबिइंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं। 

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